उदातै॑र्जिहते बृ॒हद्द्वारो॑ दे॒वीर्हि॑र॒ण्ययी॑: । पव॑मानेन॒ सुष्टु॑ताः ॥
ud ātair jihate bṛhad dvāro devīr hiraṇyayīḥ | pavamānena suṣṭutāḥ ||
उत् । आतैः॑ । जि॒ह॒ते॒ । बृ॒हत् । द्वारः॑ । दे॒वीः । हि॒र॒ण्ययीः॑ । पव॑मानेन । सुऽस्तु॑ताः ॥ ९.५.५
आर्यमुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] शरीर में इन्द्रियाँ द्वार कहलाती हैं 'अष्टचक्रा नवद्वारा०' । सोमरक्षण के द्वारा ये प्रभु प्रवण होती हैं। प्रभु-स्तवन की प्रवृत्तिवाली बनती हैं। (पवमानेन) = इस पवित्र करनेवाले सोम से ये (सुष्टुता:) = [शोभनं स्तुतं येषां ] उत्तम स्तुतिवाली होती हैं। सोम के रक्षण के होने पर भोगवृत्ति का विनाश होकर प्रभु-स्तवन की वृत्ति जगती है। [२] उस समय (द्वारः) = ये इन्द्रिय द्वार (देवी:) = [दिव् स्तुतौ] प्रभु का स्तवन करते हैं और (हिरण्ययी:) = हितरमणीय ज्ञानवाले होते हैं। तथा (उदातै:) = [आत= दिशा] उत्कृष्ट दिशाओं से (बृहत्) = खूब ही (जिहते) = गतिवाले होते हैं। जीवन में यह सोमरक्षक पुरुष उत्कृष्ट मार्ग से ही गति करता है ।
