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स न॑ ऊ॒र्जे व्य१॒॑व्ययं॑ प॒वित्रं॑ धाव॒ धार॑या । दे॒वास॑: शृ॒णव॒न्हि क॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa na ūrje vy avyayam pavitraṁ dhāva dhārayā | devāsaḥ śṛṇavan hi kam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । नः॒ । ऊ॒र्जे । वि । अ॒व्यय॑म् । प॒वित्र॑म् । धा॒व॒ । धार॑या । दे॒वासः॑ । शृ॒णव॑न् । हि । क॒म् ॥ ९.४९.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:49» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (सः) वह आप (ऊर्जे) ज्ञान और क्रिया में बलप्राप्ति के लिये (नोऽव्ययं पवित्रम्) हमारे अन्तःकरण को निश्चल करके (धारया धाव) ज्ञान की धारा से शुद्ध करें और हे भगवन् ! (कम्) आपकी उच्चारित वेदवाणियों को (देवासः हि) दिव्य गुणवाले विद्वान् ही (शृणवन्) सुनें ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो लोग दिव्य शक्तिवाले होते हैं, वे ही परमात्मा की वेदरूपी वाणी का श्रवण मनन आदि कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पवित्र हृदय में प्रभु-प्रेरणा का श्रवण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम! (सः) = वह तू (नः) = हमें ऊर्जे बल व प्राणशक्ति को प्राप्त कराने के लिये (धाव) = प्राप्त हो (अव्ययम्) = [अ-वि- अय्] इधर-उधर न भटकनेवाले (पवित्रम्) = पवित्र हृदय को तू (वि धाव) = विशेष रूप से शुद्ध कर डाल। [२] (हि) = जिससे निश्चयपूर्वक (देवासः) = देववृत्ति के बनकर हम लोग (कम्) = प्रभु की सुखकर प्रेरणा को (शृण्वन्) = सुननेवाले बनें। हमें अन्तः स्थित प्रभु की प्रेरणा सुन पड़े। यह प्रेरणा हमें उत्थान की ओर ले जाकर देव बनाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हृदय पवित्र व न भटकनेवाला बनता है । वहाँ प्रभु की प्रेरणा सुन पड़ती है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (सः) स त्वं (ऊर्जे) ज्ञाने तथा क्रियायां च बलप्राप्तये (नोऽव्ययं पवित्रम्) ममान्तःकरणं निश्चलं कृत्वा (धारया धाव) ज्ञानस्य धारया शुद्धं कुरु। अथ च हे जगदीश्वर ! (कम्) भवदुच्चारितां वेदवाणीं (देवासः हि) दिव्यगुणयुक्ता विद्वांस एव (शृणवन्) शृण्वन्तु ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For energy, give us showers in streams of imperishable purity of heart, and let the noble devotees hear the blissful music of the rain.