पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (नः) = हमारे लिये (वृष्टिम्) = सुखों के वर्षण को (आ सु पवस्व) = समन्तात् उत्तमता से प्राप्त करा सोमरक्षण के द्वारा हम सर्वथा सुखी हों । (दिवः परि) = मस्तिष्क रूप द्युलोक से (अपाम्) = कर्मों की (ऊर्मिम्) = तरंग को प्राप्त करा । अर्थात् सोमरक्षण के द्वारा हम सदा ज्ञानपूर्वक बड़े उल्लास के साथ कर्मों को करनेवाले हों। [२] हे सोम ! तू हमें उन (इषः) = प्रेरणाओं को प्राप्त करा जो कि (अयक्ष्माः) = सब प्रकार के रोगों से रहित हैं, हमें सब रोगों से ऊपर उठानेवाली हैं तथा (बृहती:) = हमारी वृद्धि का कारण बनती है । अन्तः स्थित प्रभु से हमें प्रेरणा प्राप्त होती है। यह प्रेरणा हमारे उत्थान का कारण बनती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम [क] हमें नीरोग बनाकर सुखी करता है, [ख] ज्ञानपूर्वक उत्साहमय कर्मों में लगाता है, [ग] प्रभु प्रेरणा को सुनने योग्य हमें बनाता है। यह प्रेरणा हमें नीरोग व उन्नत करती है ।