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अत॑स्त्वा र॒यिम॒भि राजा॑नं सुक्रतो दि॒वः । सु॒प॒र्णो अ॑व्य॒थिर्भ॑रत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atas tvā rayim abhi rājānaṁ sukrato divaḥ | suparṇo avyathir bharat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अतः॑ । त्वा॒ । र॒यिम् । अ॒भि । राजा॑नम् । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । दि॒वः । सु॒ऽप॒र्णः । अ॒व्य॒थिः । भ॒र॒त् ॥ ९.४८.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:48» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुक्रतो) हे शोभनकर्मों से विराजमान ! (रयिम् अभि राजानम्) आप जो कि सम्पूर्ण धनाद्यैश्वर्य के स्वामी हैं और (दिवः सुपर्णः) द्युलोक में भी चेतनरूप से विराजमान हैं और (अव्यथिभर्रत्) अनायास संसार को पालन करनेवाले हैं (अतस्त्वा) इससे आपकी स्तुति करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों का अधिपति एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए उसी परमात्मा की उपासना करनी चाहिए, जिससे बढ़कर जीव का कोई अन्य स्वामी नहीं हो सकता ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सुपर्ण अव्यथि' का सोम धारण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सुक्रतो) = शोभन कर्मन् व शोभन शक्तिवाले सोम ! (अतः) = क्योंकि तू गत मन्त्र के अनुसार असुर- पुरियों का विध्वंस करता है, इसलिए (सुपर्णः) = अपना उत्तमता से पालन व पूरण करनेवाला व्यक्ति (अव्यथिः) = कार्यों को न व्यथित होकर करनेवाला व्यक्ति (दिवः) = प्रकाश के हेतु से (भरत्) = अपने अन्दर तुझे भरता है, शरीर में ही तेरे धारण का प्रयत्न करता है। [२] हे सोम ! यह 'अव्यथि सुपर्ण' उस तेरे धारण का प्रयत्न करता है जो तू (रयिं अभि) = ऐश्वर्य का लक्ष्य करके (राजानम्) = दीप्त होनेवाला है । सोम अन्नमय आदि सब कोशों को तेज आदि ऐश्वर्यों से सम्पन्न करता है । इन ऐश्वर्यों से सम्पन्न करके यह हमें दीप्ति प्रदान करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम [क] अपने को वासनाओं के आक्रमण से बचायें तथा [ख] अनथक रूप से कार्यों में लगे रहें। यह सुरक्षित सोम हमें दीप्त जीवनवाला बनायेगा ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुक्रतो) हे शुभकर्मशोभायमान परमात्मन् ! (रयिम् अभि राजानम्) भवान् यदखिलधनाद्यैश्वर्यस्वाम्यस्ति तथा (दिवः सुपर्णः) द्युलोकेऽपि चैतन्यतया प्रतिष्ठितोऽस्ति अथ च (अव्यथिभर्रत्) विनाप्रयासतस्संसारस्य संरक्षकोऽस्ति (अतस्त्वा) अतो वयं भवतः स्तुतिं कुर्मः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For this reason of your glory and inspiring nature, O lord of holy action and self-refulgent ruler, controller and dispenser of wealth, honour and excellence, the veteran sage and scholar can invoke you from the heights of heaven without fear and difficulty.