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सि॒षा॒सतू॑ रयी॒णां वाजे॒ष्वर्व॑तामिव । भरे॑षु जि॒ग्युषा॑मसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

siṣāsatū rayīṇāṁ vājeṣv arvatām iva | bhareṣu jigyuṣām asi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सि॒सा॒सतुः॑ । र॒यी॒णाम् । वाजे॑षु । अर्व॑ताम्ऽइव । भरे॑षु । जि॒ग्युषा॑म् । अ॒सि॒ ॥ ९.४७.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:47» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजेषु अर्वताम् इव) हे परमात्मन् ! आप सर्वशक्तियों में व्यापक के समान (भरेषु जिग्युषाम्) संग्राम में जय को चाहनेवाले कर्मयोगियों को (रयीणां सिषासतुरसि) सम्पूर्ण उपयोगी पदार्थों के देनेवाले हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो संग्रामों में कर्मयोगी बनकर विजय की इच्छा करते हैं, परमात्मा उन्हीं को विजयी बनाता है ॥५॥ यह ४७वाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धनों को देने की कामनावाला [ रयीणां सिषासतुः ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (भरेषु) = संग्रामों में (जिग्युषाम्) = विजय की कामनावालों के लिये (रयीणाम्) = धनों के (सिषासतुः) = देने की कामनावाला (असि) = है । 'काम-क्रोध-लोभ' आदि आसुरभावों के साथ संग्राम करनेवाले को यह सोम उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कराता है। यह विजेता 'तेज, वीर्य, बल, ओज, मन्यु व सहस्' रूप ऐश्वर्यों को प्राप्त करनेवाला होता है। [२] (इव) = जिस प्रकार वाजेषु युद्धों में (अर्वताम्) = घोड़ों को घास आदि देते हैं, इसी प्रकार सोम हमें संग्रामविजयेच्छु होने पर सब रयि प्राप्त कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वासना-संग्राम में विजयी बनें, तो सुरक्षित सोम हमारे लिये सब ऐश्वर्यों को देता अगले सूक्त में भी 'कवि भार्गव' ही कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजेषु अर्वताम् इव) हे सर्वरक्षक परमात्मन् ! भवान् सर्वशक्तिषु व्यापक इव (भरेषु जिग्युषाम्) रणे जयमिच्छुभ्यः कर्मयोगिभ्यः (रयीणाम् सिषासतुरसि) सम्पूर्णोपयोगि-पदार्थप्रदाता चास्ति ॥५॥ इति सप्तचत्वारिंशत्तमं सूक्तं चतुर्थो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, lord of peace, prize and joy, you love to give and you are the giver of all jewels of wealth and honour to all aspirants: like success to the pioneers in the race for life’s glory, and victory to the ambitious warriors in the battles of life’s excellence.