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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: अयास्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

स प॑वस्व धनंजय प्रय॒न्ता राध॑सो म॒हः । अ॒स्मभ्यं॑ सोम गातु॒वित् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa pavasva dhanaṁjaya prayantā rādhaso mahaḥ | asmabhyaṁ soma gātuvit ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । प॒व॒स्व॒ । ध॒न॒म्ऽज॒य॒ । प्र॒ऽय॒न्ता । राध॑सः । म॒हः । अ॒स्मभ्य॑म् । सो॒म॒ । गा॒तु॒ऽवित् ॥ ९.४६.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:46» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (धनञ्जय) हे अपने उपासकों के धन को बढ़ानेवाले ! (गातुवित्) हे उपदेशकों में श्रेष्ठ ! (सः) ऐसे विद्वानों के उत्पादक आप (महः राधसः) बड़े भारी ऐश्वर्य के (प्रयन्ता) प्रदाता हैं (सोम) हे परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) आप हमारे लिये (पवस्व) सब अभीष्ट प्रदान कीजिये ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की कृपा से सदुपदेशक उत्पन्न होकर देश में सदुपदेश देकर देश का कल्याण करते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'गातुवित्' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (धनञ्जय) = हमारे लिये सब आवश्यक धनों का विजय करनेवाले सोम ! (सः) = वह तू (पवस्व) = हमें प्राप्त हो, हमारे जीवन को पवित्र कर । तू (महः राधसः) = उत्कृष्ट कार्यसाधक धन का (प्रयन्ता) = देनेवाला है । सोमरक्षण करनेवाला सदा उत्तम मार्गों से धनों का विजय करनेवाला बनता है । [२] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (गातुवित्) = मार्ग को प्राप्त करानेवाला है। हमारे लिये मार्ग का तू ज्ञान देनेवाला है। भावार्थ- सोमरक्षण से शक्ति में वृद्धि होकर हम सांसारिक अभ्युदय को प्राप्त करते हैं। इससे ज्ञान में वृद्धि होकर हम मार्ग को देखनेवाले बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (धनञ्जय) हे स्वोपासकधनानां वर्धयितः ! (गातुवित्) हे उपदेशकेषूत्तम ! (सः) एवम्भूतानां विदुषामुत्पादको भवान् (महः राधसः) महत ऐश्वर्यस्य (प्रयन्ता) प्रदातास्ति। (सोम) हे परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) अस्मभ्यं (पवस्व) सर्वमभीष्टं देहि ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, lord of joy and noble knowledge, winner of wealth and holy power, creator of great infrastructure for development, pure and powerful expert of the paths of history and social development, pray let the streams of peace and joy flow for us.