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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: अयास्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

समी॒ सखा॑यो अस्वर॒न्वने॒ क्रीळ॑न्त॒मत्य॑विम् । इन्दुं॑ ना॒वा अ॑नूषत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sam ī sakhāyo asvaran vane krīḻantam atyavim | induṁ nāvā anūṣata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । ई॒म् इति॑ । सखा॑यः । अ॒स्व॒र॒न् । वने॑ । क्रीळ॑न्तम् । अति॑ऽअविम् । इन्दु॑म् । ना॒वाः । अ॒नू॒ष॒त॒ ॥ ९.४५.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:45» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्यविम्) अतिशय सबकी रक्षा करनेवाले (वने क्रीडन्तम्) अखिल ब्रह्माण्डरूप वन में क्रीडा करते हुए (इम् इन्दुम्) इस परमात्मा की (सखायः) उसके प्रिय स्तोता लोग (अस्वरन्) शब्दायमान होते हुए (नावाः समनूषत) उसकी रचित वेदवाणीयों से स्तुति करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के ज्ञान का साधन मनुष्य के पास एकमात्र उसका स्तोत्र वेद ही है, अन्य कोई ग्रन्थ उसके पूर्णज्ञान का साधन नहीं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'नाव' रूप सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ई) = निश्चय से (सखायः) = प्रभु के मित्र (इन्दुम्) = इस सोम का (सं अस्वरन्) = सम्यक् स्तवन करते हैं। वे गुणों का प्रतिपादन करते हैं। सोम के गुणों का स्मरण सोमरक्षण के लिये प्रेरक बनता है। उसका स्तवन करते हैं जो कि वने क्(रीडन्तम्) = उपासक में [वन संभक्तौ] क्रीडा का करनेवाला है। उपासक को सोम क्रीडक की मनोवृत्तिवाला बनाता है। यह सोमरक्षक पुरुष [sport's man like spirit] क्रीडक की मनोवृत्तिवाला होता है। हम उस सोम का स्तवन करते हैं जो कि (अत्यविम्) = अतिशयेन रक्षक है। यह हमें रोगों से आक्रान्त नहीं होने देता, वासनाओं का शिकार होने से बचाता है। [२] (इन्दुम्) = इस सोम को (नावा) = एक नाव के रूप से (अनूषत) = स्तुत करते हैं। यह सोम जीवनयात्रा की पूर्ति के लिये एक नौका के समान बनता है, इसके द्वारा हम भवसागर को आसानी से पार कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें [क] क्रीडक की मनोवृत्तिवाला बनाता है, [ख] हमारा रक्षण करता है, [ग] भवसागर को तैरने के लिये नाव के समान होता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्यविम्) सर्वस्यातिरक्षकम् (वने क्रीडन्तम्) अखिलब्रह्माण्डरूपे वने क्रीडन्तम् (इम् इन्दुम्) अमुं परमात्मानं (सखायः) तदीयप्रियस्तोतारः (अस्वरन्) शब्दायमाना अभवन् भूत्वा च (नावाः समनूषत) तद्रचितवेदवाग्भिः उपतस्थिरे ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let friends and devotees on the vedi celebrate Soma, spirit of universal joy, sportive and protective in the beautiful world, and let their songs of adoration glorify the spirit of peace, beauty and divine glory.