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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: अयास्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अत्यू॑ प॒वित्र॑मक्रमीद्वा॒जी धुरं॒ न याम॑नि । इन्दु॑र्दे॒वेषु॑ पत्यते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aty ū pavitram akramīd vājī dhuraṁ na yāmani | indur deveṣu patyate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अति॑ । ऊँ॒ इति॑ । प॒वित्र॑म् । अ॒क्र॒मी॒त् । वा॒जी । धुर॑म् । न । याम॑नि । इन्दुः॑ । दे॒वेषु॑ । प॒त्य॒ते॒ ॥ ९.४५.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:45» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजी इन्दुः) उत्तम बलवाला वह परमात्मा (धुरम् अत्यक्रमीत्) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के भार के सहने में समर्थ है और (न यामनि) ध्यान करने से शीघ्र ही (देवेषु पवित्रम् पत्यते) विज्ञानियों के हृदय में अधिष्ठित होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि प्रकृति और जीव ये दोनों पदार्थ भी अपनी सत्ता से विद्यमान हैं, तथापि अधिकरण अर्थात् सबका आधार बनकर एकमात्र परमात्मा ही स्थिर है, इसलिये उसको (धुर) रूप अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के आधाररूप से कथन किया गया है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'जीवनयात्रा की पूर्ति का साधक' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम (उ) = निश्चय से (पवित्रम्) = पवित्र हृदयवाले पुरुष को (अति अक्रमीत्) = अतिशयेन प्राप्त होता है । उसी प्रकार प्राप्त होता है (न) = जैसे कि (यामनि) = जीवनयात्रा के मार्ग में (वाजा) = एक तीव्रगतिवाला घोड़ा (धुरम्) = रथ की धुरा को प्राप्त होता है। घोड़ा रथ में जुतकर हमें लक्ष्य पर पहुँचाता है। इसी प्रकार यह सोम शरीर में सुरक्षित होकर हमें ब्रह्म तक पहुँचानेवाला होता है । [२] यह (इन्दुः) = सोम (देवेषु) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों में (पत्यते) = गतिवाला होता है। वस्तुतः हमारे शरीरों में ही गतिवाला होकर यह सोम ही हमें दिव्य गुणोंवाला बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारी जीवनयात्रा की पूर्ति का साधन बनता है, यह हमें देववृत्ति का बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजी इन्दुः) उत्तमबलः स परमात्मा (धुरम् अत्यक्रमीत्) सम्पूर्णब्रह्माण्डस्य भारं सोढुं समर्थयते (न यामनि) ध्यानेन द्रुतं (देवेषु पवित्रम् पत्यते) विज्ञानिनां हृदयानि अधितिष्ठति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As the omnipotent divine energy is on top as burden bearer of the course of existence, so is Soma, peace and exhilaration of the spirit on top of the course of the pure heart and soul of the devotee and it flows into the psyche of the divine souls as the spirit of peace and joy of life.