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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: अयास्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

स प॑वस्व॒ मदा॑य॒ कं नृ॒चक्षा॑ दे॒ववी॑तये । इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa pavasva madāya kaṁ nṛcakṣā devavītaye | indav indrāya pītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । प॒व॒स्व॒ । मदा॑य । कम् । नृ॒ऽचक्षा॑ । दे॒वऽवी॑तये । इन्दो॒ इति॑ । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥ ९.४५.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:45» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा न्याय करता है, यह वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) पूर्वोक्त गुणसम्पन्न (इन्दो) हे प्रकाशमान ! आप (नृचक्षाः) सब मनुष्यों के द्रष्टा हैं (मदाय) आह्लाद के लिये और (देववीतये) यज्ञ के लिये तथा (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा की तृप्ति के लिये (कम् पवस्व) आप सुख प्रदान करिये ॥१॥
भावार्थभाषाः - जीवात्मा के हृदयमन्दिर को एकमात्र परमात्मा ही प्रकाशित करता है, अन्य कोई भी जीव को सत्यज्ञान के प्रकाश का दाता नहीं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देववीतये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (सः) = वह तू (मदाय) = हमारे उल्लास के लिये (कं पवस्व) = हमारे आनन्दों को पवित्र करनेवाला हो। हमारे आमोद-प्रमोद की पवित्रता ही 'हमें विलासी बन जाने से बचाती है। यह विलास में न फँसना हमें जीर्ण होने से बचाता है और आनन्दमय बनाये रहता है। [२] हे सोम ! तू (नृचक्षा:) = उन्नतिपथ पर चलनेवालों का [नृ] ध्यान करनेवाला है [चक्षस् ] (देववीतये) = तू दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिये होता है [वी- गति = प्राप्ति] तथा दिव्य गुणों की प्राप्ति के द्वारा (इन्द्राय) = उस प्रभु की प्राप्ति का साधन बनता है और (पीतये) = हमारे रक्षण के लिये होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमारा रक्षण करता हुआ हमें दिव्य गुणों व प्रभु को प्राप्त करानेवाला होता है।
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आर्यमुनि

अथ परमात्मा न्यायकारी इति वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशमान परमात्मन् ! (सः) स भवान् (नृचक्षाः) सर्वमनुष्यसाक्षी (मदाय) आनन्दाय (देववीतये) यज्ञाय (इन्द्राय पीतये) जीवात्मनस्तृप्तये च (कम् पवस्व) सुखं वितरतु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, spirit of light, and joy, omniscient all watchful guardian of humanity, let streams of peace, joy and well-being, pure and sacred, flow for the soul’s exhilaration in divine experience for its dedication to the service and satisfaction of the divinities.