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तं नो॒ विश्वा॑ अव॒स्युवो॒ गिर॑: शुम्भन्ति पू॒र्वथा॑ । इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ no viśvā avasyuvo giraḥ śumbhanti pūrvathā | indum indrāya pītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । नः॒ । विश्वाः॑ । अ॒व॒स्युवः॑ । गिरः॑ । शु॒म्भ॒न्ति॒ । पू॒र्वऽथा॑ । इन्दु॑म् । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥ ९.४३.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:43» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम् इन्दुम्) उस प्रकाशमान परमात्मा को (अवस्युवः नः विश्वाः गिरः) रक्षा को चाहनेवाली मेरी सम्पूर्ण वाणियें (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा की तृप्ति के लिये (पूर्वथा) पहले की तरह (शुम्भन्ति) स्तुतियों से विराजमान करती हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - वही परमात्मा मनुष्य की पूर्ण तृप्ति के लिये पर्याप्त होता है। अन्य शब्द-स्पर्शादि विषय इसको कदाचित्त् भी तृप्त नहीं कर सकते ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्राय पीतये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं इन्दुम्) = उस शक्तिशाली सोम को (नः) = हमारी (विश्वाः) = सब (अवस्युवः) = रक्षण की कामनावाली (गिरः) = स्तुति - वाणियाँ (पूर्वथा) = पालन व पूरण के प्रकार से (शुम्भन्ति) = अलंकृत करती हैं । स्तुति - वाणियाँ प्रभु के स्मरण के द्वारा हमारे जीवन में वासनाओं को नहीं पैदा होने देती । वासनाओं के अभाव में सोम हमारे शरीर में सुरक्षित रहता हुआ उसका पालन व पूरण करता है [पृ पालनपूरणयोः] । यह सोम शरीर का रोगों से पालन [बचाव ] करता है। मन का पूरण करता है, मन में वासनाओं को नहीं आने देता। [२] वासनाओं के अभाव में यह सोम (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये होता है । तथा (पीतये) = सब प्रकार से हमारे रक्षण के लिये होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु उपासना के द्वारा शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम प्रभु प्राप्ति के लिये तथा रक्षण के लिये साधन बनता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम् इन्दुम्) तं प्रकाशमानं परमात्मानं (अवस्युवः नः विश्वाः गिरः) रक्षेच्छवोऽस्माकं सर्वा गिरः (इन्द्राय पीतये) जीवात्मनः तृप्तये (पूर्वथा) प्राग्वत् (शुम्भन्ति) स्तुतिभिर्विराजयन्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Soma of beauty, bliss and glory, all our senses, in search of protection and advancement, adore and glorify as ever before for the spiritual joy of the soul.