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परि॑ णः शर्म॒यन्त्या॒ धार॑या सोम वि॒श्वत॑: । सरा॑ र॒सेव॑ वि॒ष्टप॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari ṇaḥ śarmayantyā dhārayā soma viśvataḥ | sarā raseva viṣṭapam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । नः॒ । श॒र्म॒ऽयन्त्या॑ । धार॑या । सो॒म॒ । वि॒श्वतः॑ । सर॑ । र॒साऽइ॑व । वि॒ष्टप॑म् ॥ ९.४१.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:41» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:31» मन्त्र:6 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (रसेव विष्टपम्) जिस प्रकार रस से अर्थात् ब्रह्म से लोक व्याप्त हो रहा है, उसी प्रकार (शर्मयन्त्या धारया) सुख देनेवाली आनन्द की धारासहित (नः विश्वतः परिसर) मेरे हृदय में आप भली प्रकार निवास कीजिये ॥६॥
भावार्थभाषाः - आनन्दस्त्रोत एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये आनन्दाभिलाषी जनों को चाहिये कि उसी आनन्दाम्बुधि का रसपान करके अपने आपको आनन्दित करें ॥६॥ यह ४१ वाँ सूक्त और ३१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्राक्षारस का पात्र [A cup of tea]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (शर्मयन्त्या) = सुख को देनेवाली (धारया) = धारा से (नः विश्वतः) = हमारे चारों ओर (परि सरा) = गतिवाला हो। सोम का हमारे शरीर में चारों ओर प्रवाह हो । यह प्रवाह अंग-प्रत्यंग को शक्तिशाली बनाकर हमें सुखी करनेवाला हो । [२] यह सोम हमारे अंगों में इस प्रकार प्रवाहवाला हो (इव) = जैसे कि (रसा) = द्राक्षारस (विष्टपम्) = एक पात्र [cup] में प्रवेश करता है। शरीर ही वह विष्टप [चमस = पात्र] हो, जिसमें कि रसारूप सोम का प्रवेश हो । शरीर को अन्यत्र 'चमस' कहा ही गया है । सोम के लिये रस शब्द का प्रयोग होता ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर रूप पात्र में डला हुआ यह सोम रूप द्राक्षारस हमारा कल्याण करता है । मेध्यातिथि ही कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (रसेव विष्टपम्) लोकं व्यापकतयाधितिष्ठत् ब्रह्मेव (शर्मयन्त्या धारया) शर्म प्रयच्छन्त्यानन्दधारया (नः विश्वतः परिसर) मम हृदयं सर्वतो व्याप्नुहि ॥६॥ इत्येकचत्वारिंशत्तमं सूक्तमेकत्रिंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, spirit of beauty, bliss and peace, just as the universe from centre to summit abounds in the beauty and majesty of divinity, so let us all in heart and soul be blest with showers of peace and pleasure of total well-being from all around our life in space and time.