शृ॒ण्वे वृ॒ष्टेरि॑व स्व॒नः पव॑मानस्य शु॒ष्मिण॑: । चर॑न्ति वि॒द्युतो॑ दि॒वि ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
śṛṇve vṛṣṭer iva svanaḥ pavamānasya śuṣmiṇaḥ | caranti vidyuto divi ||
पद पाठ
शृ॒ण्वे । वृ॒ष्टेःऽइ॑व । स्व॒नः । पव॑मानस्य । शु॒ष्मिणः॑ । चर॑न्ति । वि॒ऽद्युतः॑ । दि॒वि ॥ ९.४१.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:41» मन्त्र:3
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:31» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वृष्टेः इव स्वनः शृण्वे) जिसका अनुशासन मेघ की वृष्टि के समान निस्सन्देह सुना जाता है, उसी (पवमानस्य शुष्मिणः) संसार को पवित्र करनेवाले तथा सर्वोपरि बलवाले परमात्मा की (विद्युतः दिवि चरन्ति) विद्युदादि शक्तियें आकाश में भ्रमण करती हुई दिखायी देती हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की विद्युदादि अनेक शक्तियें हैं, इसलिये उसे अनन्तशक्ति ब्रह्म कहा जाता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वृष्टि का स्वन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पवमानस्य) = पवित्र करनेवाले, (शुष्मिणः) = शत्रुशोषक बलवाले इस सोम का (स्वनः) = शब्द (वृष्टेः इव) = वृष्टि के शब्द की तरह (शृण्वे) = सुनाई पड़ता है। वस्तुतः सोमरक्षण से धीमे-धीमे अध्यात्म वृत्ति में उत्त्थान होकर मनुष्य समाधि की स्थिति तक पहुँचता है। उस समय 'धर्ममेघ समाधि' में आनन्द की वृष्टि का अनुभव होता है। इसी वृष्टि का प्रस्तुत मन्त्र में उल्लेख है । [२] इस समय (दिवि) = मस्तिष्क रूप द्युलोक में (विद्युतः) = विशिष्ट ज्ञानदीप्ति रूप (विद्युत् चरन्ति) = गतिवाली होती है । सोमरक्षण से बुद्धि की सूक्ष्मता सिद्ध होती है और ज्ञान चमक उठता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से समाधि की स्थिति में होनेवाली आनन्द की वर्षा का अनुभव होता है। मस्तिष्क में ज्ञानदीप्तियाँ चमक उठती हैं ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वृष्टेः इव स्वनः शृण्वे) यस्यानुशासनं मेघवृष्टिरिव निःशङ्कं श्रूयते तस्य (पवमानस्य शुष्मिणः) संसारस्य पवितुः सर्वोत्कृष्टबलस्य च परमात्मनः (विद्युतः दिवि चरन्ति) विद्युदादिशक्तयः खे भ्राम्यन्त्यो दृश्यन्ते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The music of divinity, pure, purifying and edifying, is heard like showers of rain on earth, like flashes of lightning and roar of thunder which shine and rumble over the sky. This is the reflection of the might, majesty and generosity of Soma.
