पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो सोम (गावः न) = [अर्थं गमयन्ति] जैसे पदार्थों का ज्ञान देनेवाले हैं, उसी प्रकार (भूर्णयः) = हमारा भरण करनेवाले हैं। सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है। इस सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा हम तत्त्वज्ञान को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार ये सोम हमारे लिये 'गावः' अर्थों के गमक होते हैं। शरीर में शक्ति का संचार करते हुए ये हमारा भरण करते हैं । [२] (त्वेषाः) = ये सोम ज्ञानदीप्त हैं, हमारे ज्ञान को दीप्त करते हैं। (अयासः) = ये सोम गमनशील हैं। ज्ञानेन्द्रियों के दृष्टिकोण से ये 'त्वेष' हैं, कर्मेन्द्रियों के दृष्टिकोण से 'अयासः ' हैं। ऐसे ये सोम (प्र अक्रमुः) = शरीर में गतिवाले होते हैं । [३] ये सोम (कृष्णां त्वचम्) = हृदय पर आये हुए वासना के मलिन आवरण को (अपघ्नन्तः) = दूर विनष्ट करनेवाले हैं। मस्तिष्क को ये सोम दीप्त बनाते हैं, शरीर को गतिशील तथा हृदय को वासना के मलिन आवरण से रहित ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'दीप्त गतिशील व निर्मल' बनाते हैं।