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आ योनि॑मरु॒णो रु॑ह॒द्गम॒दिन्द्रं॒ वृषा॑ सु॒तः । ध्रु॒वे सद॑सि सीदति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yonim aruṇo ruhad gamad indraṁ vṛṣā sutaḥ | dhruve sadasi sīdati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । योनि॑म् । अ॒रु॒णः । रु॒ह॒त् । गम॑त् । इन्द्र॑म् । वृषा॑ । सु॒तः । ध्रु॒वे । सद॑सि । सी॒द॒ति॒ ॥ ९.४०.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:40» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अरुणः) सर्वव्यापी (सुतः) स्वयंसिद्ध वह परमात्मा (आयोनिं रुहत्) सम्पूर्ण प्रकृति में व्याप्त हो रहा है और (वृषा) सर्व कामनाओं का देनेवाला वह परमात्मा (सदसि) यज्ञस्थल में (इन्द्रम् गमत्) ज्ञानयोगी को प्राप्त होकर (ध्रुवे सीदति) उसके दृढविश्वासी अन्तःकरण में विराजमान होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - कर्मयोगी पुरुषों को परमात्मा सदैव उत्साह देकर सत्कर्मों में प्रवृत्त करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

योनि - आरोहण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अरुण:) = यह तेजोमय, अप्रतिहत सामर्थ्यवाला सोम (योनिम्) = अपने उत्पति स्थान इस शरीर में (आरुहत्)=- आरोहण करता है, शरीर में ही इसकी ऊर्ध्वगति होती है। ऐसी स्थिति में (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (वृषा) = शक्ति का सेचन करनेवाला होता है और (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (गमत्) = प्राप्त होता है। अथवा उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की ओर चलनेवाला होता है । [२] उस प्रभु की ओर चलता हुआ यह सोम अन्तत: (ध्रुवे सदसि) = उस (ध्रुव) = अविचल सब के आधार [सर्वाधार ] प्रभु में (सीदति) = स्थित होता है। हमें यह प्रभु को प्राप्त करानेवाला बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति होने पर यह हमें शक्तिशाली बनाता हुआ प्रभु की ओर ले चलता है, अन्ततः प्रभु में आसीन करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अरुणः) सर्वव्यापकः (सुतः) स्वयम्भूः स परमात्मा (आयोनिं रुहत्) अखिलां प्रकृतिं व्याप्नोति किञ्च (वृषा) सर्वाभिलाषदः सः (सदसि) यज्ञस्थले (इन्द्रम् गमत्) ज्ञानयोगिनं प्राप्नुवन् (ध्रुवे सीदति) तदीये दृढविश्वासेऽन्तःकरणे विराजते ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The glorious light of divinity, self-manifested and self-existent, pervades its natural abode, the world of Prakrti, and the generous spirit pervades the human soul too, and while it seats itself in the unshakable faith of man, the human soul too, purified and sanctified, abides in the eternal presence of divinity.