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त्वां य॒ज्ञैर॑वीवृध॒न्पव॑मान॒ विध॑र्मणि । अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ yajñair avīvṛdhan pavamāna vidharmaṇi | athā no vasyasas kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । य॒ज्ञैः । अ॒वी॒वृ॒ध॒न् । पव॑मान । विऽध॑र्मणि । अथ॑ । नः॒ । वस्य॑सः । कृ॒धि॒ ॥ ९.४.९

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:4» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:23» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:9


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (त्वाम्) आपको (यज्ञैः) उपासनादि यज्ञों द्वारा (अवीवृधन्) उपास्य बनाते हैं (विधर्मणि) पापीय विषयों से आप हमारी रक्षा करें (अथ) और (वस्यसः कृधि) आनन्द के भागी बनाएँ ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञों के द्वारा सोम का वर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले सोम ! (त्वाम्) = तुझे (विधर्मणि) = अपने विशिष्ट धारण के निमित्त उपासक लोग (यज्ञैः) = यज्ञों के द्वारा (अवीवृधन्) = बढ़ाते हैं । यज्ञों से वासना का उद्भव ही नहीं होता। इस प्रकार वासना के अभाव में सोम का वर्धन होता है। यह वृद्ध सोम हमारा विशेषरूप से धारण करता है। [२] इस प्रकार अथा अब विशिष्ट धारण के द्वारा, (नः) = हमें (वस्यसः) = उत्कृष्ट निवासवाला (कृधि) = करिये सोम के रक्षण से सब शक्तियों का वर्धन होता है और जीवन उत्तम बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञों में लगे रहने के द्वारा, वासना को उत्पन्न न होने देकर, हम सोम का रक्षण करें। यह हमारा विशेषरूप से धारण करेगा।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सर्वस्य पवित्रकर्त्तः परमात्मन् ! (त्वाम्) भवन्तम् (यज्ञैः) उपासनादिभिः (अवीवृधन्) उपास्यत्वेन स्थापयन्ति (विधर्मणि) पापीयविषयेभ्यो रक्षतु नः (अथ) अथ च (वस्यसः, कृधि) आनन्दभाजः करोतु भवान् ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, spirit of purity and purifying power for all, celebrants exalt you by yajnic performance in order that you protect them to abide within their bounds of Dharma. Pray protect us in our Dharma and make us happy and prosperous more and ever more.