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अ॒भ्य१॒॑र्षान॑पच्युतो र॒यिं स॒मत्सु॑ सास॒हिः । अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhy arṣānapacyuto rayiṁ samatsu sāsahiḥ | athā no vasyasas kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । अ॒र्ष॒ । अन॑पऽच्युतः । र॒यिम् । स॒मत्ऽसु॑ । स॒स॒हिः । अथ॑ । नः॒ । वस्य॑सः । कृ॒धि॒ ॥ ९.४.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:4» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:23» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अनपच्युतः) वह कूटस्थनित्य परमात्मा (रयिम् अभ्यर्ष) अपने भक्तों को ऐश्वर्य्यप्रदान करता है (अथ) और (समत्सु) संग्रामों में (सासहिः) अन्यायकारी शत्रुओं को पराजित करके अपने भक्तों को (वस्यसस्कृधि) सुखप्रदान करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो लोग न्यायशील हैं, उनको परमात्मा विजयी बनाता है और अन्यायकारी दुरात्माओं का सदैव दमन करता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रोगकृमि संहार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (समत्सु) = संग्रामों में (अनपच्युतः) = शत्रुओं से न आहत हुआ हुआ, शत्रुओं से विचलित न किया गया, (सासहि:) = शत्रुओं का पूर्ण पराभव करनेवाला, हे सोम ! तू (रयिम्) = हमारे लिये ऐश्वर्य को (अभ्यर्ष) = प्राप्त करा । [२] शरीर में वीर्य का रोगकृमियों के साथ सतत संग्राम चलता है। उस संग्राम में यह सोम अविचलित [स्थिर] होता हुआ इन रोगकृमियों का पराभव करता है। इनको विशेषरूप से कम्पित करके वह दूर भगा देता है। (अथा) = अब इन रोगकृमियों के संहार के द्वारा (नः) = हमें (वस्यसः) = उत्कृष्ट जीवनवाला (कृधि) = करिये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वीर्य के द्वारा शरीर में रोगकृमियों का संहार होकर हमारा जीवन उत्तम बने ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अनपच्युतः) स कूटस्थनित्यः परमात्मा (रयिम्) स्वभक्तेभ्य ऐश्वर्यं प्रयच्छति (अथ) अथान्यत् (समत्सु) सङ्ग्रामेषु (सासहिः) अन्यायिनः शत्रून् परित्यज्य स्वभक्तेभ्यः (वस्यसस्कृधि) श्रेयः प्रददाति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, spirit of divinity, infallible and victorious in the conflicts of nature and humanity, bring us wealth of imperishable and unconquerable character and make us happy and prosperous for ever.