र॒यिं न॑श्चि॒त्रम॒श्विन॒मिन्दो॑ वि॒श्वायु॒मा भ॑र । अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
rayiṁ naś citram aśvinam indo viśvāyum ā bhara | athā no vasyasas kṛdhi ||
पद पाठ
र॒यिम् । नः॒ । चि॒त्रम् । अ॒श्विन॑म् । इन्दो॒ इति॑ । वि॒श्वऽआ॑युम् । आ । भ॒र॒ । अथ॑ । नः॒ । वस्य॑सः । कृ॒धि॒ ॥ ९.४.१०
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:4» मन्त्र:10
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:23» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:10
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे सर्वैश्वर्यसम्पन्न परमात्मन् ! (नः) हमको (चित्रम्) नाना प्रकार के (अश्विनम्) सर्वत्र व्याप्त होनेवाले ऐश्वर्य्यों से सम्पन्न करें (अथ) और (विश्वम् आयुम्) सब प्रकार की आयु से (रयिम्) धन से भरपूर करें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सत्कर्मों द्वारा जिन पुरुषों को ऐश्वर्य के पात्र समझता है, उनको सब ऐश्वर्यों से और ज्ञानादि गुणों से परिपूर्ण करता है ॥१०॥ चौथा सूक्त और तेइसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'विश्वायु' रयि की प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = सोम ! (नः) = हमारे लिये (रयिम्) = धन को (आभर) = प्राप्त करा, जो (अश्विनम्) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला है तथा (विश्वायुम्) = पूर्ण जीवन को देनेवाला है तथा (चित्रम्) = अद्भुत है अथवा 'चिती संज्ञाते' उत्तम ज्ञान से युक्त है। वस्तुतः वही धन उत्तम है जो कि - [क] ज्ञान से युक्त है, [ख] इन्द्रियों को शक्तिशाली बनानेवाला है तथा [ग] जीवन को पूर्ण बनाता है। [२] इस प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कराके (अथा) = अब (नः) = हमें (वस्यसः) = प्रशस्त जीवनवाला (कृधि) = कर । वस्तुतः जीवन का सौन्दर्य इसी में है कि वह ज्ञान सम्पन्न हो, इन्द्रियाँ सशक्त हों, जीवन यौवन में ही समाप्त न हो जाए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से [क] ज्ञान बढ़ता है, [ख] इन्द्रियाँ सशक्त होती हैं, [ग] जीवन पूर्ण बनता है । इस प्रकार यह हिरण्य स्तूप सोम की ऊर्ध्वगति करता हुआ 'असित' बनता है, विषयों से बद्ध [सित] नहीं होता 'काश्यप'- ज्ञानी बनता है और 'देवल' दिव्य गुणों का आदान करनेवाला होता है। इसी 'असित काश्यप देवल' ऋषि का अगला सूक्त है। यह सोम का स्तवन करता हुआ कहता है कि-
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे सर्वैश्वर्यसम्पन्न भगवन् ! (नः) अस्मान् (चित्रम्) अनेकविधं (अश्विनम्) सर्वव्याप्यैश्वर्यं सम्पाद्य समर्द्धयतु (अथ) तथा च (विश्वम्, आयुम्) सर्वविधमायुः (रयिम्) धनं च सम्पाद्य समर्द्धयतु ॥१०॥चतुर्थं सूक्तं त्रयोविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma, spirit of divine peace and bliss, bring us wealth, honour and excellence of wonderful, progressive and universal character and thus make us eternally happy and prosperous more and ever more.
