आ॒विवा॑सन्परा॒वतो॒ अथो॑ अर्वा॒वत॑: सु॒तः । इन्द्रा॑य सिच्यते॒ मधु॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
āvivāsan parāvato atho arvāvataḥ sutaḥ | indrāya sicyate madhu ||
पद पाठ
आ॒ऽविवा॑सन् । प॒रा॒ऽवतः॑ । अथो॒ इति॑ । अ॒र्वा॒ऽवतः॑ । सु॒तः । इन्द्रा॑य । सि॒च्य॒ते॒ । मधु॑ ॥ ९.३९.५
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:39» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:29» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) वह स्वयम्भू परमात्मा (परावतः) दूरस्थ (अथो अर्वावतः) और समीपस्थ वस्तुओं को (आविवासन्) भली प्रकार प्रकाशित करता हुआ (इन्द्राय सिच्यते मधु) जीवात्मा के लिये आनन्दवृष्टि करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जीवात्मा के लिये आनन्द का स्रोत एकमात्र वही परमात्मा है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मधु सेचन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (परावतः) = दूरदेश से (अथ उ) = और निश्चय से (अर्वावतः) = समीप देश से (आविवासन्) = अन्धकार को दूर करनेवाला होता है [विवासयति vanishes]। समीप देश से अन्धकार को दूर करने का भाव 'प्रकृति-विषयक अज्ञान को दूर करना' है तथा दूरदेश से अन्धकार को दूर करने का भाव 'आत्मविषयक अज्ञान को दूर करना' है। इस प्रकार सुरक्षित हुआ हुआ सोम हमें 'अपरा व परा' दोनों ही विद्याओं को प्राप्त कराता है। [२] यह सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मधु सिच्यते) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाला होकर सिक्त होता है। शरीर में सुरक्षित होने पर यह सोम हमें अत्यन्त मधुर जीवनवाला बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जितेन्द्रिय पुरुष सोमरक्षण के द्वारा [क] अपरा विद्या [प्रकृति विद्या] को प्राप्त करता है, [ख] परा विद्या को प्राप्त करता है, आत्मदर्शन करता है, [ग] जीवन को मधुर बना पाता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) स स्वयम्भूः परमात्मा (परावतः) दूरस्थान् (अथो अर्वावतः) अथ च समीपस्थान् पदार्थान् (आविवासन्) सुष्ठु प्रकाशयन् (इन्द्राय सिच्यते मधु) जीवात्मने आनन्दं वर्षति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Self-manifested, illuminating the soul from far as well as from near, it rains showers of honey sweets of divine ecstasy for the soul.
