प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ननि॑ष्कृतं॒ जना॑य या॒तय॒न्निष॑: । वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pariṣkṛṇvann aniṣkṛtaṁ janāya yātayann iṣaḥ | vṛṣṭiṁ divaḥ pari srava ||
पद पाठ
प॒रि॒ऽकृ॒ण्वन् । अनिः॑ऽकृतम् । जना॑य । या॒तय॑न् । इषः॑ । वृ॒ष्टिम् । दि॒वः । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.३९.२
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:39» मन्त्र:2
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:29» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:2
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अनिष्कृतम् परिष्कृण्वन्) हे परमात्मन् ! आप अपने अज्ञानी उपासकों को ज्ञान देते हुए (जनाय इषः यातयन्) और अपने भक्तों को ऐश्वर्य प्राप्त कराते हुए (दिवः वृष्टिम् परिस्रव) द्युलोक से वृष्टि को उत्पन्न कीजिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के संसार में अद्भुत कर्म ये हैं कि उसने द्युलोक को वर्षणशील बनाया है और सूर्यादि लोकों को तेजोमय तथा पृथिवीलोक को दृढ बनाया है इत्यादि विचित्र भावों का कर्ता एकमात्र परमात्मा ही है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
आनन्द की वृष्टि
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (अनिष्कृतम्) = असंस्कृत हृदय को वासना-विनाश के द्वारा (परिष्कृण्वन्) = परिष्कृत कर देता है। सोमरक्षण से वासनाएँ विनष्ट हो जाती हैं और हृदय निर्मल हो जाता है इस प्रकार हृदय की निर्मलता से यह सोम (जनाय) = शक्तियों का प्रादुर्भाव करनेवाले पुरुष के लिये (इषः) = प्रेरणाओं को (यातयन्) प्राप्त कराता है। इस निर्मल हृदय से प्रभु की प्रेरणाओं का उद्गम होता है । [२] हे सोम ! इस प्रकार हृदयों के परिष्कृत करके, प्रेरणाओं को प्राप्त कराके तू (दिवः) = द्युलोक से, मस्तिष्क से (वृष्टिम्) = धर्ममेघ समाधि में प्राप्त होनेवाली आनन्द की वर्षा को (परिस्रव) = परिस्रुत कर । सोमरक्षण का ही परिणाम है कि हम साधना में आगे बढ़ते हुए इस आनन्द की वर्षा का अनुभव करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से [१] हृदय परिष्कृत होता है, [२] अन्तः प्रेरणायें सुन पड़ती हैं, [३] धर्ममेघ समाधि में होनेवाली आनन्द की वर्षा का अनुभव होता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अनिष्कृतम् परिष्कृण्वन्) हे परमात्मन् ! भवान् स्वज्ञानोपासकेषु ज्ञानं जनयन् (जनाय इषः यातयन्) भक्तान् ऐश्वर्यप्राप्तिं कारयँश्च (दिवः वृष्टिम् परिस्रव) द्युलोकाद् वृष्टिं स्रावय ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Go forward cleansing, purifying and perfecting the uninitiated, leading people to strive for food, energy and advancement. Indeed, bring the showers of the light of heaven on earth.
