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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: रहूगणः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

ए॒तं त्यं ह॒रितो॒ दश॑ मर्मृ॒ज्यन्ते॑ अप॒स्युव॑: । याभि॒र्मदा॑य॒ शुम्भ॑ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

etaṁ tyaṁ harito daśa marmṛjyante apasyuvaḥ | yābhir madāya śumbhate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒तम् । त्यम् । ह॒रितः॑ । दश॑ । म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ । अ॒प॒स्युवः॑ । याभिः॑ । मदा॑य । शुम्भ॑ते ॥ ९.३८.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:38» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हरितः दश अपस्युवः) परमात्मस्तुतिद्वारा पापों को हरण करनेवाली दश इन्द्रियें (एतम् त्यम्) इस परमात्मा को (मर्मृज्यन्ते) ज्ञान का विषय बनाती हैं (याभिः) जिन इन्द्रियों से (मदाय शुम्भते) आनन्द देने के लिये परमात्मा प्रकाशित होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो लोग योगादिसाधनों द्वारा अपने मन का संयम करते हैं अथवा यों कहिये कि जिन्होंने पापवासनाओं का अपने मन की पवित्रता से नाश कर दिया है, परमात्मा उन्हीं के ज्ञान का विषय होता है, मलिनात्माओं का कदापि नहीं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कर्म-व्यापूत इन्द्रियाँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एतम्) = इस (त्यम्) = प्रसिद्ध सोम को (दश) = दस संख्यावाली (अपस्युवः) = कर्मों को अपने साथ जोड़नेवाली (हरित:) = इन्द्रियाँ [इन्द्रियरूप अश्व] (मर्मृज्यन्ते) = खूब शुद्ध करती हैं । इन्द्रियाँ कर्मों में लगी रहें, तो सोम की शुद्धि बनी रहती है । उस समय वासनाओं का आक्रमण न होने से सोम में किसी प्रकार की मलिनता नहीं आती। [२] उन कर्मव्यापृत इन्द्रियों से सोम का शोधन होता है, (याभिः) = जिनसे (मदाय) = हर्ष व उल्लास के लिये शुम्भते शोभावाला होता है, अपने को सद्गुणों से अलंकृत करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - कर्म-व्यापृत इन्द्रियाँ वासनाओं से अनाक्रान्त होकर सोम का शोधन करती हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हरितः दश अपस्युवः) परमात्मस्तुत्या पापापहारकाणि दशेन्द्रियाणि (एतम् त्यम्) इमं परमात्मानं (मर्मृज्यन्ते) ज्ञानविषयीकुर्वन्ति (याभिः) यदिन्द्रियैः परमात्मा (मदाय शुम्भते) आनन्दं दातुं प्रकटति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, ten senses and ten pranas of the devotee, well controlled past sufferance and pointed to concentrative meditation, present in uninvolved purity of form, by which experience the bright presence is glorified for the soul’s joy.