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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: रहूगणः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

स वा॒जी रो॑च॒ना दि॒वः पव॑मानो॒ वि धा॑वति । र॒क्षो॒हा वार॑म॒व्यय॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa vājī rocanā divaḥ pavamāno vi dhāvati | rakṣohā vāram avyayam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । वा॒जी । रो॒च॒ना । दि॒वः । पव॑मानः । वि । धा॒व॒ति॒ । र॒क्षः॒ऽहा । वार॑म् । अ॒व्यय॑म् ॥ ९.३७.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:37» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:27» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह परमात्मा (वाजी) अत्यन्तबलवाला (दिवः रोचना) तथा अन्तरिक्ष का प्रकाशक है (रक्षोहा) असत्कर्मियों का हनन करनेवाला (वारम्) सबका भजनीय और (अव्ययम्) अविनाशी है (पवमानः) एवम्भूत परमात्मा सबको पवित्र करता हुआ (विधावति) सर्वत्र व्याप्त हो रहा है ॥३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य चन्द्रमादि सब लोक-लोकान्तर उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। स्वयंप्रकाश एकमात्र वही परमात्मा है। अन्य कोई वस्तु स्वतःप्रकाश नहीं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वाजी - पवमानः- दिवः रोचना [ रोचकः ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (वाजी) = शक्ति को देनेवाला है, (दिवः रोचना) = ज्ञान को दीप्त करनेवाला है तथा (पवमानः) = हमारे हृदयों को पवित्र करनेवाला है । [२] (रक्षोहा) = रोगकृमिरूप राक्षसों को तथा राक्षसी भावों को नष्ट करनेवाला यह सोम (अव्ययम्) = कभी नष्ट न होनेवाले (वारम्) = उस वरणीय प्रभु की ओर (विधावति) = विशिष्टरूप से गतिवाला होता है, हमें शरीर व मन में स्वस्थ बनाकर यह सोम प्रभु की ओर ले चलता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें शक्ति देता है, ज्ञान को दीप्त करता है, पवित्र करता है । राक्षसी भावों को विनष्ट करके यह हमें प्रभु को प्राप्त कराता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) सः परमात्मा (वाजी) प्रबलः (दिवः रोचना) अन्तरिक्षस्य प्रकाशकः (रक्षोहा) असत्कर्मिणां विहन्ता (वारम्) सर्वेषां सेव्यः (अव्ययम्) अविनाशी चास्ति (पवमानः) एवम्भूतः परमात्मा सर्वं पवित्रयन् (विधावति) सर्वत्र व्यापकत्वेन वर्तते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This dynamic omnipotent Spirit, light of heaven, pure and purifying, vibrates universally and rushes to the chosen imperishable soul of the devotee, destroying negativities, sin and evil.