तं गी॒र्भिर्वा॑चमीङ्ख॒यं पु॑ना॒नं वा॑सयामसि । सोम॒ जन॑स्य॒ गोप॑तिम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
taṁ gīrbhir vācamīṅkhayam punānaṁ vāsayāmasi | somaṁ janasya gopatim ||
पद पाठ
तम् । गीः॒ऽभिः । वा॒च॒म्ऽई॒ङ्ख॒यम् । पु॒ना॒नम् । वा॒स॒या॒म॒सि॒ । सोम॑म् । जन॑स्य । गोऽप॑तिम् ॥ ९.३५.५
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:35» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वाचमीङ्खयम्) वेदवाणियों में निवास करनेवाले (पुनानम्) सबको पवित्र करनेवाले (जनस्य गोपतिम्) मनुष्यों की इन्द्रियवृत्तियों को प्रेरणा करनेवाले (तम् सोमम्) उस परमात्मा को (गीर्भिः) स्तुतियों द्वारा (वासयामसि) अपने अन्तःकरण में बसाते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के स्व अन्तःकरण में धारण करने का उपाय यह है कि पुरुष उसके सद्गुणों का चिन्तन करके उसके स्वरूप में मग्न हो जाय, इसी का नाम परमात्मप्राप्ति वा परमात्मयोग है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पुनान - गोपति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तम्) = उस (वाचमीङ्खयम्) = ज्ञान की वाणियों के प्रेरित करनेवाले (सोमम्) = सोम को [वीर्यशक्ति को ] (गीर्भिः) = ज्ञान की वाणियों से (वासयामसि) = अपने अन्दर बसाते हैं। ज्ञान प्राप्ति में लगे रहने से चित्त निर्मल रहता है और वासनाओं के आक्रमण के अभाव में सोम शरीर में ही सुरक्षित रहता है। यह सोम (पुनान) = हमारे जीवनों को पवित्र बनाता है । [२] उस सोम को हम शरीर में सुरक्षित करते हैं, जो कि (जनस्य गोपतिम्) = लोगों की इन्द्रियों का (पति) = रक्षक है। रक्षित सोम इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ानेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का रक्षण स्वाध्याय में लगे रहने से सम्भव है। यह सोम हमारे जीवन को पवित्र व सशक्त इन्द्रियोंवाला बनाता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वाचमीङ्खयम्) वेदवाक्षु निवसन्तं (पुनानम्) सर्वं पवित्रयन्तं (जनस्य गोपतिम्) मानुषेन्द्रियवृत्तीः प्रेरयन्तं (तम् सोमम्) तं परमात्मानं (गीर्भिः) स्तुतिभिः (वासयामसि) स्वान्तःकरणे निवासयामः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - With hymns of adoration we exalt and glorify Soma, inspirer of song, purifier, saviour and guardian of humanity and their lands, cows and culture.
