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अ॒भि गावो॑ अनूषत॒ योषा॑ जा॒रमि॑व प्रि॒यम् । अग॑न्ना॒जिं यथा॑ हि॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi gāvo anūṣata yoṣā jāram iva priyam | agann ājiṁ yathā hitam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । गावः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । योषा॑ । जा॒रम्ऽइ॑व । प्रि॒यम् । अग॑न् । आ॒जिम् । यथा॑ । हि॒तम् ॥ ९.३२.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:32» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (योषा जारमिव प्रियम्) “योषयति आत्मनि प्रीतिमुत्पादयतीति योषा रात्रिः तस्या जारो जारयिता चन्द्रस्तम्”। चन्द्रमा के समान सर्वप्रिय (आजिम्) प्राप्त करने योग्य (हितम्) सबका हित करनेवाले आप (यथा अगन्) जिस प्रकार प्राप्त हो जायें, उसी प्रकार (गावः) इन्द्रियवृत्तियें (अभ्यनूषत) आपको विषय करती हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों की ओर से परमात्मा की प्रार्थना कथन की गयी है और परमात्मनिष्ठप्रियता की तुलना चन्द्रमा के साथ की है अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा आह्लादक होने से सर्वप्रिय है, इसी प्रकार परमात्मा भी आह्लादक होने से सर्वप्रिय है। कई एक टीकाकार “योषा जारम्” के अर्थ स्त्री के जार के करते हैं अर्थात् जैसे स्त्री को अपना यार प्यारा होता है, उसी प्रकार मुझ उपासक को तुम प्यारे हो। पहले तो यह दृष्टान्त विषम है, क्योंकि स्त्री को सर्वदा यार प्यारा नहीं लगता, किन्तु जब तक मोहमयी युवावस्था रहती है, तभी तक प्यारा लगता है और दूसरे जार शब्द के अर्थ सर्वत्र वेदमन्त्रों में तमोनिवर्तक आह्लादक गुण के हैं, जैसा कि ‘स्वसारं जारोऽभ्येति पश्वात्” इस मन्त्र में जार के अर्थ आह्लादक गुण के ही सब भाष्यकारों ने किये हैं। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि ‘योषा जार’ यहाँ चन्द्रमा का नाम है, किसी लम्पट कामी पुरुष का नहीं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु-स्मरण व युद्ध

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (गावः) = ज्ञान की वाणियाँ व इन्द्रियाँ उसी प्रकार (अभि अनूषत) = दिन के दोनों ओर प्रातः सायं प्रभु का स्तवन करती हैं, (इव) = जैसे कि कोई (योषा) = स्त्री (प्रियं जारम्) = अपने प्रिय व्यक्ति को स्तुत करती है। वह स्त्री जैसे अपने प्रिय का सर्वभावेन स्मरण करती है, इसी प्रकार इस उपासक की वाणियाँ प्रभु का ही स्तवन करती हैं । [२] ये (यथा) = जैसे प्रभु स्मरण करते हैं, उसी प्रकार (हितं आजिम्) = हितकर संग्राम को वासनाओं के साथ चलनेवाले सात्त्विक संग्राम को (अगन्) = प्राप्त होते हैं। यह संग्राम मनुष्य का वास्तविक हित करनेवाला है, यही सात्त्विक संग्राम है। इस संग्राम में प्रभु स्मरण से ही तो विजय होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस प्रकार प्रातः - सायं प्रभु स्मरण करते हुए हमें इस सात्त्विक संग्राम को करते चलना है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (योषा जारमिव प्रियम्) चन्द्रमिव सर्वप्रियं (आजिम्) प्राप्यं (हितम्) सर्वस्येष्टदं भवन्तं (यथा अगन्) यथा प्राप्ताः स्युः तथा (गावः) इन्द्रियवृत्तयः (अभ्यनूषत) त्वां विषयीकुर्वन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as a maiden admires, longs for and meets her darling lover, so do all perceptions of sense and conceptions of mind with the consciousness concentrate on the divine presence as is their love and faith and reach their end and aim.