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आ न॒: शुष्मं॑ नृ॒षाह्यं॑ वी॒रव॑न्तं पुरु॒स्पृह॑म् । पव॑स्व सोम॒ धार॑या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā naḥ śuṣmaṁ nṛṣāhyaṁ vīravantam puruspṛham | pavasva soma dhārayā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । शुष्म॑म् । नृ॒ऽसह्य॑म् । वी॒रऽव॑न्तम् । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् । पव॑स्व । सो॒म॒ । धार॑या ॥ ९.३०.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:30» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (नः) हमको आप (शुष्मम्) जो बल (नृषाह्यम्) शत्रु को नाश करनेवाला (वीरवन्तम्) वीरतावाला (पुरुस्पृहं) सर्वोपरि है, उसकी (धारया) सुवृष्टि से (आ पवस्व) भली प्रकार पवित्र करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष सर्वोपरि बल की कामना करते हुए अपने आपको उस बल के योग्य बनाते हैं, उनको संसार में न्याय नियम फैलाने के लिये सर्वोपरि बल अवश्यमेव मिलता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नृषाह्य शुष्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू धारया अपनी धारण शक्ति से नः = हमारे लिये शुष्मम् = शत्रु- शोषक बल को आपवस्व = सर्वथा प्राप्त करा । [२] उस बल को प्राप्त करा, जो कि नृषाह्यम् = सब मनुष्यों का पराभव करनेवाला है, जो हमें 'ईश्वरभाव' से युक्त करता है, हमें शासन शक्ति प्राप्त कराता है। वीरवन्तम्- जो बल वीर पुत्रोंवाला है, हमारे सन्तानों को भी वीर बनानेवाला है। पुरुस्पृहम् = पालक व पूरक होता हुआ स्पृहणीय है । यह बल शरीर का पालन करता है, मन का पूरण करता है और अतएव स्पृहणीय होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'नृषाह्य- वीरवान्- पुरुस्पृह' बल को प्राप्त कराता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (नः) अस्मान् भवान् (शुष्मम्) यद्बलं (नृषाह्यम्) शत्रुनाशकम् (वीरवन्तम्) वीर्य्यवत् (पुरुस्पृहं) सर्वोत्तममस्ति तस्य (धारया) सुवृष्ट्या (आ पवस्व) पवित्रीकरोतुतराम् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, lord of strength and enlightenment, let showers of strength worthy of the brave and victorious inspiring to prowess and chivalry loved by all flow to us in streams of plenty and abundance.