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ए॒ष दिवं॒ व्यास॑रत्ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तः । पव॑मानः स्वध्व॒रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa divaṁ vy āsarat tiro rajāṁsy aspṛtaḥ | pavamānaḥ svadhvaraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । दिव॑म् । वि । आ । अ॒स॒र॒त् । ति॒रः । रजां॑सि । अस्पृ॑तः । पव॑मानः । सु॒ऽअ॒ध्व॒रः ॥ ९.३.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:3» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:21» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) वही परमात्मा (दिवम्) द्युलोक को (व्यासरत्) प्राप्त है (रजांसि) परमाणु में लोक-लोकान्तरों को (तिरः) आच्छादन करके (अस्पृतः) अविनाशी भाव से (पवमानः) पवित्र और (स्वध्वरः) अहिंसकरूप से विराजमान है ॥८॥
भावार्थभाषाः - वह नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा सर्वत्र विराजमान है और उसी की सत्ता से सब लोक-लोकान्तर परिभ्रमण करते हैं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्वध्वर' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एष:) = यह सोम (अस्पृतः) = [स्पृणाति to kill ] न नष्ट किया गया हुआ (रजांसि तिरः) = सब रजोगुण के भावों को तिरस्कृत करके (दिवं व्यासरत्) = प्रकाश की ओर गतिवाला होता है । सुरक्षित सोम जीवन को प्रकाशमय बनाता है। [२] (पवमानः) = यह सोम हमारे हृदयों को पवित्र करता है और (स्वध्वरः) = हमारे जीवनों को उत्तम यज्ञोंवाला बनाता है। मस्तिष्क दीप्त होने पर और हृदय के पवित्र होने पर जीवन यज्ञमय क्यों नहीं बनेगा ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यदि सोम का हम रक्षण करेंगे तो यह हमारे जीवनों को प्रकाशमय, पवित्र व यज्ञिय बनायेगा ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) स परमात्मा (दिवम्) द्युलोकं (व्यासरत्) प्राप्तोऽस्ति (रजांसि) परमाणुषु लोकलोकान्तरम् (तिरः) आच्छाद्य (अस्पृतः) अविनाशिभावेन (पवमानः) पवित्रतया (स्वध्वरः) अहिंसकत्वेन च विराजते ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This spirit radiates to the heavens across the atomic oceans of skies and spaces, unhurt and unopposed, pure, purifying, performing the cosmic yajna of love, non-violence and creation of new life in evolution.