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ए॒ष दे॒वो वि॑प॒न्युभि॒: पव॑मान ऋता॒युभि॑: । हरि॒र्वाजा॑य मृज्यते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa devo vipanyubhiḥ pavamāna ṛtāyubhiḥ | harir vājāya mṛjyate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । दे॒वः । वि॒प॒न्युऽभिः॑ । पव॑मानः । ऋ॒त॒युऽभिः॑ । हरिः॑ । वाजा॑य । मृ॒ज्य॒ते॒ ॥ ९.३.३

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:3» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:3


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एष देवः) यह पूर्वोक्त देव (विपन्युभिः ऋतायुभिः) सत्यवक्ता विद्वानों द्वारा (पवमानः) पवित्र वर्णन किया गया है। (हरिः) यह सब दुःखों का दूर करनेवाला परमात्मदेव (वाजाय) ज्ञानयज्ञ के लिये (मृज्यते) उपास्य रक्खा जाता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जिस पूर्णपुरुष को विद्वान् लोग इन्द्रियागोचर कथन करते हैं, वही पूर्ण पुरुष ज्ञानयज्ञ द्वारा ज्ञानियों के ज्ञानगम्य होकर उपास्य भाव को प्राप्त होता है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देव- पवमान - हरि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह सोम (देवः) = रोगकृमियों को पराजित करने की कामनावाला होता है । (पवमानः) = हमारे अन्तःकरणों को पवित्र करता है । (हरिः) = सब कष्टों व पापों का हरण करता है, हमें सुखी व पुण्यशाली बनाता है। [२] यह (विपन्युभिः) = प्रभु का विशिष्ट स्तवन करनेवाले पुरुषों से तथा (ऋतायुभिः) = ऋत के द्वारा गति करनेवाले पुरुषों से [ऋत + 'इ' गतौ] (वाजाय) = शक्ति प्राप्ति के लिये (मृज्यते) = शुद्ध किया जाता है। प्रभु-स्तवन व नियमित आचरण हमें वासनाओं का शिकार नहीं होने देते और इस प्रकार हम सोम को परिशुद्ध रखने में समर्थ होते हैं, परिशुद्ध सोम 'देव' हैं 'पवमान' है, 'हरि' है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ' उपासना' व 'नियमित गति' हमें सोमरक्षण के योग्य बनाती है।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एष, देवः) पूर्वोक्तो देवः (विपन्युभिः, ऋतायुभिः) सत्यवचनैर्विद्वद्भिः (पवमानः) पवित्रतया वर्णितः (हरिः) सर्वदुःखहारकः परमात्मा (वाजाय) ज्ञानयज्ञाय (मृज्यते) उपास्यते ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This refulgent spirit, light of life, saviour and harbinger of joy, glorified by celebrants and poets of rectitude is praised and adored for the achievement of victory and advancement.