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ए॒ष दे॒वो अम॑र्त्यः पर्ण॒वीरि॑व दीयति । अ॒भि द्रोणा॑न्या॒सद॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa devo amartyaḥ parṇavīr iva dīyati | abhi droṇāny āsadam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । दे॒वः । अम॑र्त्यः । प॒र्ण॒वीःऽइ॑व । दी॒य॒ति॒ । अ॒भि । द्रोणा॑नि । आ॒ऽसद॑म् ॥ ९.३.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:3» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब पूर्वोक्त परमात्मदेव के गुणों का कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (एष देवः) जिस परमात्मदेव का पूर्व वर्णन किया गया, वह (अमर्त्यः) अविनाशी है। (आसदम्) सर्वत्र व्याप्त होने के लिये वह परमात्मा (अभि द्रोणानि) प्रत्येक ब्रह्माण्ड को (पर्णवीः) विद्युत् शक्ति के (इव) समान (दीयति) प्राप्त है ॥१॥
भावार्थभाषाः - दीव्यतीति देव:=जो सबको प्रकाश करे, उसको देव कहते हैं। सर्वप्रकाशक देव अनादिसिद्ध और अविनाशी है, उसकी गति प्रत्येक ब्रह्माण्ड में है, वही परमात्मा इस संसार की उत्पति स्थिति संहार का करनेवाला है, उसी की उपासना सबको करनी चाहिये ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अमर्त्य देव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह सोम (देवः) = [विजिगीषा] शरीरों के अन्दर व्याप्त हुआ हुआ रोगों को जीतने की कामना करता है और (अमर्त्यः) = हमें रोगों से मरने नहीं देता। सुरक्षित सोम [वीर्य] रोगकृमियों को नष्ट करता है और इस प्रकार असमय की मृत्यु से हमें बचाता है। [२] यह सोम (द्रोणानि अभि आसदम्) = शरीरूप पात्रों में आसीन होने के लिये (पर्णवीः इव) = एक पक्षी की तरह (दीयति) = गति करता है। जैसे एक पक्षी दोनों पंखों को गतिमय करके ऊपर और ऊपर उठता चलता है, इसी प्रकार यह सोम शरीर में ब्रह्म व क्षत्र [ ज्ञान व बल] दोनों का वर्धन करता हुआ ऊर्ध्वगतिवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें मृत्यु से बचाता है । यह शरीर में ब्रह्म व क्षत्र का वर्धन करता हुआ ऊर्ध्वगतिवाला होता है
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आर्यमुनि

अथ पूर्वोक्तस्य परमात्मदेवस्य गुणा निर्दिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (एष, देवः) पूर्ववर्णितः परमात्मा (अमर्त्यः) अविनाशी अस्ति। सः (आसदम्) सर्वं व्याप्तुम् (अभि, द्रोणानि) प्रतिब्रह्माण्डम् (पर्णवीः) विद्युत् (इव) यथा (दीयति) प्राप्तः ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, spirit of divinity, eternal and immortal, expands to regions of the universe like soaring energy and pervades there as an immanent presence.