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प्रास्य॒ धारा॑ अक्षर॒न्वृष्ण॑: सु॒तस्यौज॑सा । दे॒वाँ अनु॑ प्र॒भूष॑तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prāsya dhārā akṣaran vṛṣṇaḥ sutasyaujasā | devām̐ anu prabhūṣataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । अ॒स्य॒ । धाराः॑ । अ॒क्ष॒र॒न् । वृष्णः॑ । सु॒तस्य॑ । ओज॑सा । दे॒वान् । अनु॑ । प्र॒ऽभूष॑तः ॥ ९.२९.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:29» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा अभ्युदयप्राप्ति के साधनों का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रभूषतः) प्रभुत्व अर्थात् अभ्युदय को चाहनेवाले पुरुष का कर्तव्य यह है कि वह (देवान् अनु) विद्वानों का अनुयायी बने और (सुतस्य ओजसा) नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त परमात्मा के तेज से अपने आपको तेजस्वी बनावे (वृष्णः अस्य धाराः) जो सर्वकामप्रद है, उसकी धारा से (अक्षरन्) अपने को अभिषिक्त करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषो ! तुम विद्वानों की संगति के विना कदापि अभ्युदय को नहीं प्राप्त हो सकते। जिस देश के लोग नाना प्रकार की विद्याओं के वेत्ता विद्वानों के अनुयायी बनते हैं, उस देश का ऐश्वर्य देश-देशान्तरों में फैल जाता है। इसलिये हे अभ्युदयाभिलाषी जनों ! तुम भी विद्वानों के अनुयायी बनो ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ओजस्विता न दिव्यगुण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य) = इस (सुतस्य) = उत्पन्न हुए हुए (वृष्णः) = शक्ति को देनेवाले सोम की (धाराः) = धारायें (प्र अक्षरन्) = शरीर में प्रवाहित होती हैं । [२] शरीर में प्रवाहित होने पर ये सोम की धारायें (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (देवान् अनु) = दिव्य गुणों को (अनु) = लक्ष्य करके (प्रभूषतः) = [ प्रभवितुमिच्छतः ] हमें शक्तिशाली बनाने की कामना करती हैं। यह सोम हमें ओजस्वी बनाता है । हमें शक्तिशाली बनाकर हमारे अन्दर दिव्य गुणों का वर्धन करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में सुरक्षित सोम हमें ओजस्वी व दिव्य गुण सम्पन्न बनाता है ।
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आर्यमुनि

अथ परमात्मनाऽभ्युदयप्राप्तेः साधनानि वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रभूषतः) प्रभुत्वमिच्छन्तः पुरुषस्येदं कर्तव्यं यत्सः (देवान् अनु) विदुषामनुयायी स्यात् किं च (सुतस्य ओजसा) नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्य परमात्मनस्तेजसा आत्मानं तेजस्विनं विदध्यात् (वृष्णः अस्य धाराः) सर्वकामप्रदस्य परमात्मनः कृपाधारा (अक्षरन्) आत्मानमभिषिञ्चेत् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In character with its self-refulgence, and glorifying its divine powers in nature and humanity, the streams of this mighty virile Soma, pure and immaculate, flow forth with the light and lustre of its omnipotence.