सं दे॒वैः शो॑भते॒ वृषा॑ क॒विर्योना॒वधि॑ प्रि॒यः । वृ॒त्र॒हा दे॑व॒वीत॑मः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
saṁ devaiḥ śobhate vṛṣā kavir yonāv adhi priyaḥ | vṛtrahā devavītamaḥ ||
पद पाठ
सम् । दे॒वैः । शो॒भ॒ते॒ । वृषा॑ । क॒विः । योनौ॑ । अधि॑ । प्रि॒यः । वृ॒त्र॒ऽहा । दे॒व॒ऽवीत॑मः ॥ ९.२५.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:25» मन्त्र:3
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:15» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - सर्वजगत् का उत्पादक वह परमात्मा (देवैः) दिव्यशक्तियों के द्वारा (सम् शोभते) शोभा को प्राप्त हो रहा है (वृषा) सब कामनाओं का देनेवाला है (कविः) सर्वज्ञ (योनौ अधि) प्रकृतिरूप योनि में अधिष्ठित अर्थात् अधिष्ठानरूप से जो विराजमान है (प्रियः) वह सर्वप्रिय और (वृत्रहा) अज्ञान का नाश करनेवाला (देववीतमः) विद्वानों के हृदय में प्रकाशरूप से विराजमान है ॥३॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है, तथापि उसको साक्षात् करनेवाले विद्वानों के हृदय में विशेषरूप से विराजमान है। इसी अभिप्राय से गीता में कहा है कि “नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः” माया के सम्बन्ध के कारण परमात्मा सबको अपने-२ हृदय में प्रतीत नहीं होता, वरन् सबके हृदय में आकाशवत् परिपूर्णरूप से विराजमान है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वृषा-कविः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वृषा) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम (देवैः सं शोभते) = दिव्य गुणों के साथ शोभायमान होता है। यह हमारे में दिव्य गुणों का वर्धन करता है । (कविः) = हमें क्रान्तप्रज्ञ बनाता है । एवं 'वृषा' सोम हमें शक्ति की प्राप्ति कराता है। 'कवि' सोम हमें क्रान्तप्रज्ञ बनानेवाला है। हमारे मनों को यह दिव्य गुणों से युक्त करता है। [२] (योनौ) = यह सोम हमें मूल उत्पत्ति-स्थान प्रभु में (अधिप्रियः) = आधिक्येन प्रीतिवाला करता है । [२] (वृत्रहा) = प्रभु में प्रीति के द्वारा ही यह वासनाओं को विनष्ट करता है और (देववीतमः) = दिव्य गुणों को अधिक से अधिक प्राप्त करानेवाला है । वासनाओं के विनाश से ही सद्गुणों का विकास होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें शक्तिशाली व ज्ञानी बनाता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - सर्वजगज्जनकः स परमात्मा (देवैः) दिव्यशक्तिभिः (सम् शोभते) द्योततेतरां (वृषा) सर्वकामदः (कविः) सर्वज्ञः (योनौ अधि) प्रकृतिरूपायां योनौ अधिष्ठानरूपेण विराजमानः (प्रियः) सर्वप्रियः (वृत्रहा) अज्ञानध्वंसकः (देववीतमः) विदुषां हृदये प्रकाशरूपेण विराजमानश्चास्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma, omniscient poetic creator, generous and dear, dearest of divinities and destroyer of the evil and darkness of life, vibrating in the cave of the heart shines glorious in the soul and reflects beatific with the senses, mind, intelligence and will in the conduct and grace of the human personality.
