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ए॒त उ॒ त्ये अ॑वीवश॒न्काष्ठां॑ वा॒जिनो॑ अक्रत । स॒तः प्रासा॑विषुर्म॒तिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eta u tye avīvaśan kāṣṭhāṁ vājino akrata | sataḥ prāsāviṣur matim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒ते । ऊँ॒ इति॑ । त्ये । अ॒वी॒व॒श॒न् । काष्ठा॑म् । वा॒जिनः॑ । अ॒क्र॒त॒ । स॒तः । प्र । अ॒सा॒वि॒षुः॒ । म॒तिम् ॥ ९.२१.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:21» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:11» मन्त्र:7 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनः) सब प्रकार के ऐश्वर्यवाला (त्ये एते उ) वही पूर्वोक्त परमात्मा (अवीवशन्) सबको वश में रखता हुआ (सतः मतिम्) सत्कर्मियों की बुद्धि को (असाविषुः) शुभ मार्ग की ओर लगाता हुआ (पराम् काष्ठाम् अक्रत) परम काष्ठा को प्राप्त कराता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मा की ओर झुकते हैं, अर्थात् यमनियमादि साधन सम्पन्न होकर संयमी बनते हैं, वे ब्रह्मविद्या की पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। इसी अभिप्राय से उपनिषदों में यह कहा है कि ‘सा काष्ठा सा परा गतिः’ ॥७॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

काष्ठा प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एते वे उ) = निश्चय से (त्ये) = वे सोमकण (अवीवशन्) = सदा हमारे हित की कामना करते हैं। हमारे रोगकृमि रूप शरीर शत्रुओं को तथा वासनारूप मानस शत्रुओं को विनष्ट करके ये हमारा हित करते हैं । [२] ये (वाजिनः) = शक्ति को देनेवाले सोमकण (काष्ठां अक्रत) = जीवन के लक्ष्य- स्थान को करनेवाले होते हैं । अर्थात् ये मनुष्य को लक्ष्य स्थानभूत प्रभु तक पहुँचानेवाले होते हैं रहेगा। 'सा काष्ठा सा परागति:' । [२] इसी उद्देश्य से ये सोम (सतः) = एक सत्पुरुष की (मतिम्) = बुद्धि को (प्रासाविषुः) = उत्पन्न करते हैं। एक सज्जन पुरुष की बुद्धि इन रक्षित सोमकणों से दीप्त हो उठती है, सूक्ष्म विषयों का वह ग्रहण करनेवाली बनती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-रक्षित सोमकण [क] हमारा हित करते हैं, [ख] हमें लक्ष्य स्थान पर पहुँचाते हैं, [ग] हमारे में सद्बुद्धि का विकास करते हैं । सूक्त का भाव एक वाक्य में यही है कि सोमरक्षण से हम प्रभु को प्राप्त करते हैं। अगले सूक्त में भी सोम की महिमा का ही वर्णन है—
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनः) सर्वविधैश्वर्यवान् (त्ये एते उ) स एव पूर्वोक्तः परमात्मा (अवीवशन्) सर्वान् वशीकरोति तथा च (सतः मतिम्) सत्कर्मणां बुद्धिं (असाविषुः) शुभमार्गाभिमुखं प्रेरयति च (पराम् काष्ठाम् अक्रत) एवम्भूतः परमकाष्ठां प्रापयति ॥७॥ एकविंशतितमं सूक्तमेकादशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus do these soma streams of victorious divine light and energy wish and shine and create and lead us to the supreme state of joy, and thus do they animate, inspire and fructify the thought and will of the truly wise.