स वह्नि॑र॒प्सु दु॒ष्टरो॑ मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः । सोम॑श्च॒मूषु॑ सीदति ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
sa vahnir apsu duṣṭaro mṛjyamāno gabhastyoḥ | somaś camūṣu sīdati ||
पद पाठ
सः । वह्निः॑ । अ॒प्ऽसु । दु॒स्तरः॑ । मृ॒ज्यमा॑नः । गभ॑स्त्योः । सोमः॑ । च॒मूषु॑ । सी॒द॒ति॒ ॥ ९.२०.६
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:20» मन्त्र:6
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:10» मन्त्र:6
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:6
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सः सोमः) वह परमात्मा (अप्सु) लोक-लोकान्तर में विद्यमान है और (वह्निः) सबका प्रेरक है और (दुष्टरः) दुराधर्ष है (गभस्त्योः) अपने प्रकाश से (मृज्यमानः) स्वयं प्रकाशित है (चमूषु सीदति) न्यायकारियों की सेना में स्वयम् विराजमान होता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि परमात्मा के भाव सर्वत्र भावित हैं, तथापि जैसे न्यायकारी सम्राजों की सेनाओं में उनके रौद्र वीर भयानकादि भाव प्रस्फुटित होते हैं, ऐसे अन्यत्र नहीं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'दुष्टर' सोम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (वह्निः) = हमारे लिये ज्ञान व शक्ति आदि को प्राप्त करानेवाला है। (अप्सु) = कर्मों में (दुष्टर:) = विघ्नों से आसानी से पराभूत होनेवाला नहीं । अर्थात् सोमरक्षक पुरुष कर्मों को करता हुआ विघ्नों से पराजित नहीं हो जाता। (मृज्यमानः) = शुद्ध किया जाता हुआ यह (गभस्त्यो:) = बाहुओं में होता है । अर्थात् भुजाओं को यह शक्तिशाली बनाता है। [२] यह (सोमः) = सोम (चमूषु) = शरीररूप पात्रों में (सीदति) = आसीन होता है। वस्तुतः इस सोम [वीर्य] का आधारभूत पात्र यह शरीर ही है। शरीर में सुरक्षित होने पर यह उसे 'सत्य, यश व श्री' से सम्पन्न करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रक्षित सोम हमें ज्ञान व शक्ति प्राप्त कराता है। कर्मों में विघ्नों से पराभूत नहीं होने देता ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सः सोमः) स परमात्मा (अप्सु) प्रतिलोकं विद्यमानः (वह्निः) सर्वेषां प्रेरकश्च तथा (दुष्टरः) दुराधर्षोऽस्ति (गभस्त्योः) स्वप्रकाशैः (मृज्यमानः) प्रकाशमानः (चमूषु सीदति) न्यायकारिसेनाषु स्वयं विराजते च ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - That lord Soma, burden bearer of existence, is the universal inspirer, energiser and enlightener, the very passion and fire of life, pervasive in the waters of space, unconquerable, blazing in the self-circuit of his own refulgence, and he abides in the holy ladles of yajna as much as in the mighty majestic armies of the universe.
