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अ॒स्मभ्य॑मिन्दविन्द्र॒युर्मध्व॑: पवस्व॒ धार॑या । प॒र्जन्यो॑ वृष्टि॒माँ इ॑व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmabhyam indav indrayur madhvaḥ pavasva dhārayā | parjanyo vṛṣṭimām̐ iva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्मभ्य॑म् । इ॒न्दो॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ऽयुः । मध्वः॑ । प॒व॒स्व॒ । धार॑या । प॒र्जन्यः॑ । वृ॒ष्टि॒मान्ऽइ॑व ॥ ९.२.९

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:2» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:9


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमैश्वर्य्ययुक्त और (इन्द्रयुः) सर्वव्यापक परमात्मन् ! (मध्वः) आनन्द की (धारया) वृष्टि से (वृष्टिमान्) वर्षा करनेवाले (पर्जन्यः) मेघ के (इव) समान आप (अस्मभ्यम्) हमको (पवस्व) पवित्र करे ॥९॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार मेघ अपनी वृष्टि से भूमि का सिञ्चन कर देता है, उसी प्रकार हे परमात्मन् ! आप अपनी आनन्दरूप वृष्टि से हमको पवित्र तथा सिक्त करें ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'इन्द्रयु' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = सोम ! तू (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (इन्द्रयुः) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को प्राप्त कराने की कामनावाला है। तेरे रक्षण से हमें प्रभु की प्राप्ति होती है, इस प्रकार तू हमारे साथ प्रभु को जोड़नेवाला है। तू (मध्वः) = माधुर्य की (धारया) = धारा से (पवस्व) = हमारे में क्षरित हो । तू हमें प्राप्त हो और तेरे द्वारा हमारा जीवन मधुर बने । [२] तू हमारे लिये (वृष्टिमान् पर्जन्य:) = वृष्टिवाले बादल की (इव) = तरह है । जिस प्रकार यह पर्जन्य संताप को दूर करके शान्ति को देनेवाला होता है, उसी प्रकार तू हमारे सब सन्तापों, रोगों व वासनाओं को शान्त करके हमें सुखी करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रक्षित सोम हमें प्रभु को प्राप्त कराता है।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे ऐश्वर्य्ययुक्त (इन्द्रयुः) सर्वव्यापक परमात्मन् ! (मध्वः) आनन्दस्य (धारया) वृष्ट्या (वृष्टिमान्) वर्षुकः (पर्जन्यः) मेघः (इव) यथा भवान् (अस्मभ्यम्) अस्मान् (पवस्व) पुनातु ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For us, O lord of peace and bliss, munificent giver of lustre and grandeur, bring showers of purity and the honey sweets of life as a cloud laden with showers of rain.