प्र पु॑ना॒नस्य॒ चेत॑सा॒ सोम॑: प॒वित्रे॑ अर्षति । क्रत्वा॑ स॒धस्थ॒मास॑दत् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pra punānasya cetasā somaḥ pavitre arṣati | kratvā sadhastham āsadat ||
पद पाठ
प्र । पु॒ना॒नस्य॑ । चेत॑सा । सोमः॑ । प॒वित्रे॑ । अ॒र्ष॒ति॒ । क्रत्वा॑ । स॒धऽस्थ॑म् । आ । अ॒स॒द॒त् ॥ ९.१६.४
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:16» मन्त्र:4
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:4
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (चेतसा प्र पुनानस्य) चित्त को पवित्र करनेवाले द्रव्य का जो (सोमः) सोमरस है, वह (पवित्रे अर्षति) पवित्र लोगों में ज्ञान को उत्पन्न करता है, फिर वह मनुष्य (क्रत्वा) शुभकर्मों को करके (सधऽस्थम्) सद्गति को (आसदत्) प्राप्त होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - सोमरस, जो कि पवित्र और सुन्दर द्रव्यों से निकाला गया है अर्थात् जो स्वभाव को सौम्य बनाता है, उसका रस मनुष्य में शुभ बुद्धि को उत्पन्न करता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञान के द्वारा पवित्रता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (चेतसा) = ज्ञान के द्वारा (पुनानस्य) = अपने जीवन को पवित्र करते हुए व्यक्ति का (सोमः) = सोम [वीर्य] (पवित्रे) = पवित्र हृदय में (प्र अर्षति) = प्रकर्षेण प्राप्त होनेवाला होता है। हृदय की पवित्रता के होने पर सोम शरीर में सुरक्षित रहता है । [२] (क्रत्वा) = इस सोमरक्षण से प्राप्त शक्ति के द्वारा (सधस्थम्) = प्रभु के साथ एकत्र वास को (आसदत्) = प्राप्त होता है । सोमरक्षण से जीव अपने पवित्र हृदय में प्रभु के प्रकाश को देखता है। यही प्रभु के साथ एक स्थान में स्थित होना है । ' नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः 'यह आत्मा निर्बल से लभ्य नहीं है। सोम हमें बल प्राप्त कराता है और प्रभु के मेल का अधिकारी बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान में लगे रहने से हम विषयों से बचे रहते हैं, इस प्रकार हमारा जीवन पवित्र रहता है और हम प्रभु का दर्शन करनेवाले होते हैं।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (चेतसा प्र पुनानस्य) चित्तं पवित्रीकुर्वाणस्य द्रव्यस्य यः (सोमः) सोमरसोऽस्ति सः (पवित्रे) सत्कर्मसु ज्ञानमुत्पादयति ततः स मनुष्यः (क्रत्वा) शुभकर्माणि कृत्वा (सधऽस्थम्) सद्गतिं (आसदत्) प्राप्नोति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The soma joy of the person who is purified through the mind and intellect abides in the purity of heart, and by virtue of his karma he attains his position in the presence of divinity.
