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प्र ते॑ सो॒तार॑ ओ॒ण्यो॒३॒॑ रसं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये । सर्गो॒ न त॒क्त्येत॑शः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra te sotāra oṇyo rasam madāya ghṛṣvaye | sargo na takty etaśaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । ते॒ । सो॒तारः॑ । ओ॒ण्योः॑ । रस॑म् । मदा॑य । घृष्व॑ये । सर्गः॑ । न । त॒क्ति॒ । एत॑शः ॥ ९.१६.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:16» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब सात्त्विक भाव को उत्पन्न करनेवाले रसों का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रसोतारः) हे जिज्ञासु लोगो ! (ते) तुम्हारे (मदाय) आनन्द के लिये और (घृष्वये) शत्रुओं के नाश के लिये (ओण्योः) द्यावापृथिवी के मध्य में (रसम्) सौम्य स्वभाव का देनेवाला रस (सर्गः) बनाया है, जो (एतशः न तक्ति) विद्युत् के समान तीक्ष्णता देनेवाला है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों ! तुम ऐसे रस का पान करो, जिससे तुम में बल उत्पन्न हो और शत्रुओं पर विजयी होने के लिये तुम सिंह के समान आक्रमण कर सको ! यहाँ इस रस के अर्थ किसी रसविशेष के नहीं किन्तु आह्लादजनक रसमात्र के हैं ॥ वा यों कहो कि सौम्य स्वभाव उत्पन्न करनेवाले रस के हैं, इसलिये इसको सोमरस भी कहा जा सकता है और ‘धात्वर्थ’ भी इसका यह है कि ‘रस आस्वादने रस्यते स्वाद्यत इति’ जो आनन्द से वा आनन्द के लिये आस्वादन किया जाय, उसका नाम यहाँ रस है। इस प्रकरण में यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि सोम के अर्थ रस के और कहीं सोम के अर्थ ईश्वर के ऐसा व्यत्यय क्यों ? इसका उत्तर यह है कि “स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्” २।३।५। इस ब्रह्मसूत्र में इस बात का निर्णय कर दिया है कि एक प्रकरण ही नहीं, किन्तु एक वाक्य में भी तात्पर्य भेद से दो अर्थ हो जाते हैं, जैसे कि “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्म” तै० ३।२। तप से ब्रह्म की जिज्ञासा करो और तप ब्रह्म है। यहाँ पहले ब्रह्म शब्द के अर्थ ईश्वर के और द्वितीय ब्रह्म शब्द के अर्थ तप के हैं और यह नियम वेद ब्राह्मण उपनिषद् और शास्त्र सर्वत्र ही पाया जाता है, जैसे कि शतपथ में यज्ञ नाम यज्ञ का भी और यज्ञ नाम ईश्वर का भी है। अग्नि नाम भौतिक अग्नि का भी और अग्नि नाम ईश्वर का भी है ॥ इस नियम के अनुसार यहाँ सोम के अर्थ कहीं सोम रस के और कहीं ईश्वर के किये गये हैं, इसमें कोई दोष नहीं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मदाय धृष्वये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (ओण्योः) = द्यावापृथिवी में मस्तिष्क व शरीर में (मदाय) = आनन्द [हर्ष] के लिये तथा (घृष्वये) = शत्रुओं के घर्षण के लिये मस्तिष्क में ज्ञान के प्रकाश से आनन्द की प्राप्ति के लिये तथा शरीर में रोगकृमियों के विनाश के लिये (ते रसम्) = तेरे रस को [सार को] (प्रसोतारः) = प्रकर्षेण उत्पन्न करने के लिये होते हैं। सोम [वीर्य] का सार ही ओजस् है । इस ओजस्विता से मस्तिष्क में [splendour, light] प्रकाश होता है, तथा शरीर में [bodily strength] शक्ति उत्पन्न होती है। [२] (सर्गः) = [सृष्टः ] उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (एतशः न) = अश्व की तरह (तक्ति) = गतिवाला होता है । इस सोम के द्वारा शरीर के सब इन्द्रियाश्व शक्तिशाली बनते हैं । शक्तिशाली बनकर ये शरीर रथ का उत्तम संचालन करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में उत्पन्न हुआ हुआ सोम उल्लास व शत्रु विनाश के लिये होता है। इससे इन्द्रिय अश्व शक्ति सम्पन्न बनकर शरीर रथ को तीव्र गति से मार्ग पर ले चलते हैं ।
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आर्यमुनि

अथ सात्त्विकरसोत्पादका रसा वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रसोतारः) भो जिज्ञासवः ! (ते) युष्माकम् (मदाय) आनन्दाय (घृष्वये) शत्रुनिवर्हणाय (ओण्योः) द्यावापृथिव्योर्मध्ये (रसम्) सौम्यस्वभावप्रदाता रसः भवदर्थं (सर्गः) सृष्टः यः (एतशः न तक्ति) विद्युदिव तीक्ष्णतां ददाति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, spirit of peace and bliss, your devotees, in order to win the highest attainments of life and to experience the joy of divinity, meditate and sojourn over spaces between heaven and earth and find the divine essence of existence, and then omnipresent divinity flows like a flood into their consciousness. O man, that essence of experience is for you.