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ए॒ष हि॒तो वि नी॑यते॒ऽन्तः शु॒भ्राव॑ता प॒था । यदी॑ तु॒ञ्जन्ति॒ भूर्ण॑यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa hito vi nīyate ntaḥ śubhrāvatā pathā | yadī tuñjanti bhūrṇayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । हि॒तः । वि । नी॒य॒ते॒ । अ॒न्तरिति॑ । शु॒भ्रऽव॑ता । प॒था । यदि॑ । तु॒ञ्जन्ति॑ । भूर्ण॑यः ॥ ९.१५.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:15» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यदि भूर्णयः) यदि उपासक लोग (तुञ्जन्ति) उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, तो (शुभ्रावता) शुभ (पथा) मार्ग द्वारा (एषः हितः) उस हितकारक परमात्मा को (अन्तः विनीयते) अन्तःकरण में स्थिर करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो लोग यम-नियमों का पालन करते हैं, वे अपने अन्तःकरण में परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं और परम पद को लाभ करते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुभ्र मार्ग से

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद् ई) = जब निश्चय से (भूर्णयः) = उत्तम भरण करनेवाले पुरुष (तुञ्जन्ति) = [ To kill ] काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं का संहार कर पाते हैं तो (एषः) = यह (अन्तः हितः) = शरीर के अन्दर स्थापित हुआ हुआ (शुभ्रावता पथा) = उत्तम शोभावाले मार्ग से (विनीयते) = लक्ष्य -स्थान की ओर, ब्रह्म की ओर ले जाया जाता है। [२] जब मनुष्य भूर्णि बनता है, स्वार्थ से ऊपर उठकर परार्थ में चलता हुआ सब का भरण करनेवाला बनता है, तो वह लोभ आदि आसुर वृत्तियों को समाप्त कर पाता है। इससे यह सोम का रक्षण करने में समर्थ होता है। रक्षित सोम के द्वारा इसका जीवन मार्ग उत्तम बनता है और यह प्रभु की ओर चलता हुआ अन्ततः प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वार्थ से ऊपर उठकर परार्थ में प्रवृत्त होकर हम काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करके सोम का रक्षण करें। इससे हम शुभ्र मार्ग का आक्रमण करते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले होंगे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यदि भूर्णयः) यद्युपासकाः (तुञ्जन्ति) तदाज्ञां पालयन्ति तदा (शुभ्रावता) शुभेन (पथा) मार्गेण (एषः हितः) तं हितकरम् (अन्तः विनीयते) अन्तःकरणे सुस्थापयन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This divine Spirit is attained and internalised in the core of the heart and soul by the brilliant path of clairvoyance, when the passionate seekers surrender themselves in obedience to it.