नि॒रि॒णा॒नो वि धा॑वति॒ जह॒च्छर्या॑णि॒ तान्वा॑ । अत्रा॒ सं जि॑घ्नते यु॒जा ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
niriṇāno vi dhāvati jahac charyāṇi tānvā | atrā saṁ jighnate yujā ||
पद पाठ
नि॒ऽरि॒णा॒नः । वि । धा॒व॒ति॒ । जह॑त् । शर्या॑णि । तान्वा॑ । अत्र॑ । सम् । जि॒घ्र॒ते॒ । यु॒जा ॥ ९.१४.४
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:14» मन्त्र:4
| अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:4
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - उक्त परमात्मा (निरिणानः) ज्ञान का विषय होता हुआ (तान्वा) अपने प्रकाश से (शर्याणि) अपनी प्रकाशरश्मियों को छोड़ता हुआ (विधावति) जिज्ञासु के बुद्धिगत होता है (अत्र युजा) उस परमात्मा में युक्त होकर (सम् जिघ्नते) उपासक लोग अज्ञानों का नाश करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - ध्यान का विषय हुआ वह परमात्मा जिज्ञासुओं के अन्तःकरणों को निर्मल करता है और जिज्ञासुजन उस की उपासना करते हुए अज्ञान का नाश करके परम गति को प्राप्त होते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु के साथ मेल
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार सुरक्षित हुआ हुआ सोम (नि-रिणान:) = [ To expel, drive out] सब बुराइयों को शरीर से पृथक् करता हुआ (विधावति) = जीवन को बड़ा शुद्ध बना डालता है 'धाव् शुद्धौ'। यह सोम (तान्वा) = शक्तियों के विस्तार के द्वारा (शर्याणि) = [शृ हिंसावाम्] हमारी हिंसा करनेवाले काम-क्रोध आदि मानस शत्रुओं को तथा रोगकृमिरूप शारीर शत्रुओं को (जहत्) = यह त्यागनेवाला होता है। शरीर में रक्षित सोम शक्तियों को बढ़ाता है और आधि-व्याधियों को विनष्ट करता है । [२] इस प्रकार इस शरीर को शुद्ध बनाकर (अत्र) = यहाँ इस शरीर में (युजा) = उस अपने साथी के साथ (संजिघ्रते) = संगत होता है [ संगतो भवति सा० ] प्रभु ही सखा हैं, उनके साथ मेल इस सोम के द्वारा ही होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शरीर का शोधन कर देता है, इस शुद्ध शरीर में जीव प्रभु रूप मित्र को प्राप्त करता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - उक्तः परमात्मा (निरिणानः) ज्ञानविषयो भवन् (तान्वा) स्वप्रकाशेन (शर्याणि) स्वप्रकाशरश्मिवर्गं जहत् (विधावति) जिजासुबुद्धौ तिष्ठति (अत्र युजा) अत्र परमात्मनि योगेन (सम् जिघ्नते) उपासकाः स्वाज्ञानं घ्नन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Apprehended with discrimination and clear vision, it descends into the devotee’s consciousness, releasing light by its radiations, and, joining the devotee, it destroys his darkness and ignorance.
