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परि॒ प्रासि॑ष्यदत्क॒विः सिन्धो॑रू॒र्मावधि॑ श्रि॒तः । का॒रं बिभ्र॑त्पुरु॒स्पृह॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari prāsiṣyadat kaviḥ sindhor ūrmāv adhi śritaḥ | kāram bibhrat puruspṛham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । प्र । अ॒सि॒स्य॒द॒त् । क॒विः । सिन्धोः॑ । ऊ॒र्मौ । अधि॑ । श्रि॒तः । का॒रम् । बिभ्र॑त् । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् ॥ ९.१४.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:14» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब उक्त परमात्मा के अन्य गुणों का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धोः ऊर्मौ) जिसने समुद्र की लहरों का (अधि श्रितः) निर्माण किया (कारम् बिभ्रत् पुरुस्पृहम्) जिसने सर्वजनों के मनोरथरूप इस कार्यब्रह्माण्ड को बनाया (कविः) वही परमात्मा (परि प्रासिष्यदत्) सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है ॥१॥
भावार्थभाषाः - उस परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड में नाना प्रकार की रचनाओं को बनाया है, कहीं महासागरों में अनन्त प्रकार की लहरें उठती हैं, कहीं हिमालय के उच्च शिखर नभोमण्डलवर्ती वायुओं से संघर्षण कर रहे हैं, एवं नाना प्रकार की रचनाओं का रचयिता वही परमात्मा है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पुरुस्पृह कार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] रक्षित हुआ हुआ सोम हमारे ज्ञान को बढ़ाता है, सो यह 'कवि' कहाता है । यह (कविः) = क्रान्तदर्शी सोम (परिप्रासिष्यदत्) = शरीर में रुधिर के साथ चारों ओर प्रवाहित होता है । यह (सिन्धोः ऊर्मौ) = ज्ञान - समुद्र की [रायः समुद्राँश्चतुरः ] तरंगों में (अधिश्रितः) = आधिक्येन आश्रित होता है। अर्थात् यह सोम हमें ज्ञान के शिखर पर ले जानेवाला होता है । [२] यह सोम (कारम्) = इस शरीररूप रथ को [car] (बिभ्रत्) = धारण करता है । रक्षित सोम इस रथ का ऐसा रक्षण करता है कि यह (पुरुस्पृहम्) = बहुत स्पृहणीय रूपवाला होता है, स्वस्थ व सुन्दर शरीर को बनाने में सोम का ही प्रथम स्थान है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-रक्षित सोम ज्ञान को बढ़ाता है तथा शरीर को स्वस्थ व सुन्दर बनाता है ।
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आर्यमुनि

अथोक्तपरमात्मनोऽन्ये गुणा वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धोः ऊर्मौ) यः समुद्रतरङ्गाणां (अधि श्रितः) निर्माता (कारम् बिभ्रत् पुरुस्पृहम्) येन सर्वजनमनोरथरूपः संसारो निरमायि (कविः) स एव परमात्मा (परि प्रासिष्यदत्) सर्वत्र व्याप्नोति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pervading and reposing in transcendence over the dynamics of this expansive ocean of the universe, bearing and sustaining this poetic creation, the omniscient poet creator, Soma, lord of peace, joy and bliss, rolls and rules the world with pleasure and grace, frpr TPaNfeT: TS5T stmt 3 4-4 db I MirbcpUclpH 1 &|u[if|qj| ||