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सोम॑: पुना॒नो अ॑र्षति स॒हस्र॑धारो॒ अत्य॑विः । वा॒योरिन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somaḥ punāno arṣati sahasradhāro atyaviḥ | vāyor indrasya niṣkṛtam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोमः॑ । पु॒ना॒नः । अ॒र्ष॒ति॒ । स॒हस्र॑ऽधारः । अति॑ऽअविः । वा॒योः । इन्द्र॑स्य । निः॒ऽकृ॒तम् ॥ ९.१३.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:13» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:1» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा की यज्ञादिकर्मप्रियता और दानप्रियता को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) ‘सुते चराचरं जगदिति सोमः’ सब चराचर जगत् को उत्पन्न करनेवाला वह परमात्मा (पुनानः अर्षति) सबको पवित्र करता हुआ सब जगह व्याप्त हो रहा है और (सहस्रधारः) सहस्त्रों वस्तुओं को धारण करनेवाला है (अत्यविः) अत्यन्त रक्षक है और (वायोः) कर्मशील तथा (इन्द्रस्य) ज्ञानशील विद्वानों का (निष्कृतम्) उद्धार करनेवाला है ॥१॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि परमात्मा सर्वरक्षक है, वह किसी को द्वेषदृष्टि से नहीं देखता, तथापि वह सत्कर्मी पुरुषों को शुभ फल देता है और असत्कर्मियों को अशुभ, इसी अभिप्राय से उस को कर्मशील पुरुषों का प्यारा वर्णन किया है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गतिशील इन्द्र का 'निष्कृत'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोमः) = वीर्य (वायो:) = गतिशील (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (निष्कृतम्) = संस्कृत हृदय को (अर्षति) = प्राप्त होता है। हृदय के पवित्र होने पर ही सोम शरीर में सुरक्षित होता है। हृदय की पवित्रता 'वायु व इन्द्र' को प्राप्त होती है। वायु गतिशील व्यक्ति है, जो कभी अकर्मण्य नहीं होता । इसीलिए इसे वासनाएँ नहीं सताती। आलस्य के साथ ही वासनाओं का सम्बन्ध है । इस सोमरक्षण के लिये जितेन्द्रियता भी आवश्यक है। अजितेन्द्रिय के लिये सोमरक्षण नितान्त असम्भव है । 'जितेन्द्रियता व पवित्रता' पर्यायवाची से शब्द हैं । [२] रक्षित हुआ हुआ सोम (पुनानः) = पवित्र करनेवाला होता है । (सहस्त्रधारः) = अनेक प्रकार से हमारा धारण करनेवाला है। (अत्यविः) = अतिशयेन रक्षण करनेवाला है। यह रोगकृमियों को नष्ट करके हमारे शरीरों का रक्षण करता है तथा 'इर्ष्या- द्वेष-क्रोध' को नष्ट करके हमारे मनों का रक्षण करता है। ज्ञानाग्नि का तो एक मात्र ईंधन होता हुआ यह बुद्धि का रक्षण करनेवाला होता है। इस प्रकार यह सर्वोत्तम रक्षक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - गतिशील जितेन्द्रिय बनकर हम सोम का रक्षण करें। रक्षित हुआ हुआ यह हमें पवित्र करें, हमारा धारण करे, हमारे 'शरीर, मन व बुद्धि' का रक्षण करे।
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आर्यमुनि

अधुना परमात्मनः यज्ञादिकर्मप्रियता दानप्रियता च वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) चराचरजगदुत्पादकः परमात्मा (पुनानः अर्षति) सर्वं पावयन् सर्वत्र व्याप्नोति तथा च (सहस्रधारः) सहस्राणि वस्तूनि धारयति (अत्यविः) अत्यन्तरक्षकोऽस्ति (वायोः) कर्मशीलस्य (इन्द्रस्य) ज्ञानशीलस्य च विदुषः (निष्कृतम्) उद्धारकोऽस्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, beauty, joy, power and divinity of life, pure, and purifying, vibrates every where and flows free in a thousand streams, inspiring, energising and protecting, it is released and sanctified by Vayu, cosmic energy and empowered by Indra, divine omnipotence, distilled by vibrant sages, received by creative humanity and spread abroad by ruling powers.