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य इन्दो॒: पव॑मान॒स्यानु॒ धामा॒न्यक्र॑मीत् । तमा॑हुः सुप्र॒जा इति॒ यस्ते॑ सो॒मावि॑ध॒न्मन॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya indoḥ pavamānasyānu dhāmāny akramīt | tam āhuḥ suprajā iti yas te somāvidhan mana indrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । इन्दोः॑ । पव॑मानस्य । अनु॑ । धामा॑नि । अक्र॑मीत् । तम् । आ॒हुः॒ । सु॒ऽप्र॒जाः । इति॑ । यः । ते॒ । सो॒म॒ । अवि॑न्धत् । मनः॑ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११४.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:114» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब मुक्तपुरुष के ऐश्वर्य का निरूपण करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो पुरुष (पवमानस्य) सबको पवित्र करनेवाले (इन्दोः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा के (धामानि) कर्म, उपासना तथा ज्ञानरूप तीनो काण्डों का (अनु, अक्रमीत्) भले प्रकार अनुष्ठान करता है, (तं) उसको (सुप्रजाः, इति, आहुः) शुभ जन्मवाला कहा जाता है। (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (यः) जो पुरुष (ते) तुम्हारे में (मनः) मन (अविधत्) लगाता है, (इन्द्राय) उस उपासक के लिये (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! आप (परि, स्रव) ज्ञानगति से प्रवाहित हों ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष कर्म, उपासना तथा ज्ञान द्वारा परमात्मप्राप्ति का भले प्रकार अनुष्ठान करता है, या यों कहो कि जब उपासक अनन्य भक्ति से परमात्मपरायण होकर उसी की उपासना में तत्पर रहता है, तब परमात्मा उसके अन्तःकरण में स्वसत्ता का आविर्भाव उत्पन्न करते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुप्रजा:

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) = जो (सोम) = हे सोम ! (पवमानस्य) = पवित्र करनेवाले (इन्दो:) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ये तेरे (धामानि) = तेजों को (अनु अक्रमीत्) = अनुक्रमेण प्राप्त करता है, (तम्) = उसी को ('सुप्रजाः') = शोभन प्रजा वाला व उत्तम विकास वाला (इति) = इस प्रकार (आहुः) = कहते हैं। सोम को सुरक्षित करके सोम के तेजों को धारण करनेवाला पुरुष ही 'सुप्रजा' बनता है । हे (इन्दो) = सोम ! (यः) = जो (ते) = तेरी प्राप्ति के लिये (मनः अविधत्) = मन को, दृढसंकल्प को करता है उस (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्स्रव) = तू शरीर में चारों ओर परिस्रुत हो । तूने ही शरीर में व्याप्त होकर सब शक्तियों का सम्यक् विकास करना है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये हम दृढ़संकल्प वाले बनें। इस सोम की शक्तियों को धारण ' बन पायेंगे।
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आर्यमुनि

अथ मुक्तैश्वर्यं निरूप्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) यो जनः (पवमानस्य) सर्वपावकस्य (इन्दोः) प्रकाशमयपरमात्मनः (धामानि) ज्ञानकर्मोपासनारूपकाण्डत्रयस्य (अनु, अक्रमीत्) अनुष्ठानं करोति (तं) तं जनं (सुप्रजाः, इति, आहुः) शुभजन्मानं कथयन्ति। (सोम) हे परमात्मन् ! (यः) यः पुरुषः (ते) त्वयि (मनः) चेतः (अविधत्) योजयति तस्मै (इन्द्राय) उपासकाय (इन्दो) हे परमात्मन् ! (परि, स्रव) ज्ञानगत्या प्रवहतु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - One who rises and lives upto the presence, rules and laws of vibrant omnipresent Soma, light of the world, they say, he is the man, fulfilled in the self and family. O Soma, spirit of light and joy divine, vibrate and bless the man who dedicates his mind and sense, will and action to your presence and law.