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यत्र॒ राजा॑ वैवस्व॒तो यत्रा॑व॒रोध॑नं दि॒वः । यत्रा॒मूर्य॒ह्वती॒राप॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yatra rājā vaivasvato yatrāvarodhanaṁ divaḥ | yatrāmūr yahvatīr āpas tatra mām amṛtaṁ kṛdhīndrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्र॑ । राजा॑ । वै॒व॒स्व॒तः । यत्र॑ । अ॒व॒ऽरोध॑नम् । दि॒वः । यत्र॑ । अ॒मूः । य॒ह्वतीः । आपः॑ । तत्र॑ । माम् । अ॒मृत॑म् । कृ॒धि॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:113» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:27» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र) जिस अवस्था में (वैवस्वतः, राजा) काल ही राजा है, (यत्र, अवरोधनं, दिवः) यहाँ दिन तथा रात का वशीकरण है, (यत्र, अमूः, यह्वतीः आपः) यहाँ उक्त आध्यात्मिक ज्ञानों का बाहुल्य है, (तत्र) उस पद में (मां) मुझको (अमृतं, कृधि) अमृत बनाओ। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्राय) ज्ञानयोगी के लिये (परि, स्रव) पूर्णाभिषेक के निमित्त बनें ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा ज्ञानयोगी को सत्य तथा अमृत के निर्णय में अभिषिक्त करता है अर्थात् ज्ञानयोगीरूप राजा सत्य तथा अनृत का निर्णय करके अपने विवेकरूप राज्य को अटल बनाता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मर्यादा -ज्ञान-शक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्दो) = सोम ! (माम्) = मुझे (तत्र) = उस लोक में (अमृतं कृधि) = अमर [नीरोग] बना, (यत्र) = जहाँ (वैवस्वतः) = विवस्वान् का पुत्र [ विवस्= ज्ञान किरणें] अतिशय ज्ञान सम्पन्न पुरुष (राजा) = शासक है, जीवन को बड़ा व्यवस्थित बनानेवाला है । और (यत्र) = जहाँ (दिवः अवरोधनम्) = ज्ञान का अवरोधन- प्रवेश है। ‘अवरोध' शब्द अन्तःपुर के लिये प्रयुक्त होता है । सो जहाँ ज्ञान के देवताओं का ही स्थान है। तथा (यत्र) = जहाँ (अमूः) = वे (यह्वती:) = महान् (आपः) = रेतः कण रूप जलों का स्थान है | सोमरक्षण ज्ञान वृद्धि के द्वारा जीवन को व्यवस्थित कर देता है, ज्ञान का तो यह अन्तःपुर ही बन जाता है, महत्त्वपूर्ण रेतःकणों को शरीर में व्याप्त करके यह सोमरक्षण हमें अमृतत्व प्राप्त कराता है । सो, हे (इन्दो) = सोम ! तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्रव) = परिस्रुत हो, शरीर में चारों ओर व्याप्त होनेवाला हो। शरीर में व्याप्त होकर ही तू हमारे इस शरीर को अमृत बनाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से शरीर व्यवस्थित ज्ञान सम्पन्न व नीरोग बनता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र) यस्यामवस्थायां (वैवस्वतः, राजा) काल एव राजास्ति (यत्र,अवरोधनम्, दिवः)  यत्राह्नो रात्रेश्च वशीकरणं (यत्र, अमूः, यह्वतीः, आपः) यत्रोक्ताध्यात्मिकज्ञानस्य बाहुल्यं (तत्र) तस्मिन् पदे (मां) मां (अमृतं, कृधि) अमृतं करोतु (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् !भवान् (इन्द्राय)  उक्तज्ञानयोगिने  (परि, स्रव)  पूर्णाभिषेकहेतुर्भवतु ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Where eternal Time is the ruler supreme, where light and bliss is self- contained eternally without obstruction of mutability, where those mighty streams of bliss flow within constant Infinity, there, O Soma, place me immortal. Indu, O spirit of joy, generosity and grace, flow for Indra, soul of the system of existence in the service of divinity.