पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋतद्युम्न) = सत्य ज्ञानवाले, सत्य ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले, सोम ! तू (ऋतं वदन्) = हमारे जीवनों में ऋत को उच्चारित करता है। सोम के रक्षण से सत्य ज्ञान की उत्पत्ति होकर जीवन सत्यमय बन जाता है। हे (सत्यकर्मन्) = सत्य कमों वाले, सब क्रियाओं से असत्य को दूर करनेवाले, सोम ! तू (सत्यं वदन्) = हमारे जीवनों में सत्य का ही उच्चारण करता है । क्रियाओं को नियमपूर्वक करना 'ऋत' है, और उत्तम क्रियाओं को करना ही 'सत्य' है । हे राजन् जीवनों को दीप्त करनेवाले (सोम) = सोम ! तू (श्रद्धां वदन्) = हमारे जीवनों में श्रद्धा को कहनेवाला हो, हमारे जीवनों को श्रद्धामय बना। हमें उस प्रभु में पूर्ण आस्था है । हे (सोम) = सोम ! तू (धात्रा) = उस प्रभु के द्वारा, प्रभु स्मरण के द्वारा (परिष्कृतः) = निर्मल किया जाता है। प्रभु स्मरण हमें वासनाओं से बचाता है, और इस प्रकार सोम निर्मल बना रहता है । हे (इन्दो) = निर्मल सोम ! तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्त्रव) = शरीर में चारों ओर परिस्रुत हो । तेरे इस शरीर में धारण के होने पर ही हमारा जीवन 'ऋत, सत्य व श्रद्धा' वाला बन पाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें सत्य ज्ञान वाला, सत्य कर्मों वाला व श्रद्धामय बनाता है ।