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प॒र्जन्य॑वृद्धं महि॒षं तं सूर्य॑स्य दुहि॒ताभ॑रत् । तं ग॑न्ध॒र्वाः प्रत्य॑गृभ्ण॒न्तं सोमे॒ रस॒माद॑धु॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parjanyavṛddham mahiṣaṁ taṁ sūryasya duhitābharat | taṁ gandharvāḥ praty agṛbhṇan taṁ some rasam ādadhur indrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒र्जन्य॑ऽवृद्धम् । म॒हि॒षम् । तम् । सूर्य॑स्य । दु॒हि॒ता । आ । अ॒भ॒र॒त् । तम् । ग॒न्ध॒र्वाः । प्रति॑ । अ॒गृ॒भ्ण॒न् । तम् । सोमे॑ । रस॑म् । आ । अ॒द॒धुः॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:113» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पर्जन्यवृद्धं) सघन घटा के समान वृद्धि को प्राप्त (सूर्यस्य, दुहिता) द्युलोक की पुत्री श्रद्धा (तम्) उक्त गुणसम्पन्न (महिषं) पूजायोग्य राजा को (आभरत्) ऐश्वर्य्यरूप गुणों से भरपूर करती है, (तं) उस राजा की (गन्धर्वाः) गानविद्या के वेत्ता जो (प्रति, अगृभ्णन्) प्रत्येक भाव ग्रहण करनेवाले हैं, (सोमे) “सूते चराचरञ्जगदिति सोमः”=जो सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति करे, उसका नाम यहाँ “सोम” है (तं, रसं) उक्त परमात्मविषयक रस को (आदधुः) धारण करते हुए गन्धर्व लोग (इन्द्राय) उपर्युक्त गुणसम्पन्न राजा के लिये गान करें। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (परि, स्रव) ऐसे राजा के लिये राज्याभिषेक का निमित्त बनें ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र का भाव यह है कि श्रद्धायुक्त राजा ही ऐश्वर्य्यशाली होता और परमात्मा उसी को राज्याभिषेक के योग्य बनाता है अर्थात् आस्तिक राजा ही अटल ऐश्वर्य्य भोगता है, अन्य नहीं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तं गन्धर्वाः प्रत्यगृभ्णन्

पदार्थान्वयभाषाः - [पर्जन्यो वा उद्गाता श० १२ । १ । १ । ३] (पर्जन्यवृद्धम्) = उद्गाता के द्वारा जिसका वर्धन किया जाता है, प्रभु गुणगान करनेवाले से जिसका उत्कर्ष प्रतिपादित किया जाता है (तम्) = उस (महिषम्) = पूज्य प्रभु को (सूर्यस्य दुहिता) = उस प्रकाशमय प्रभु की पुत्री यह वेदवाणी (अभरत्) = हमारे अन्दर प्राण करती है । जब हम स्वाध्याय द्वारा ज्ञान का वर्धन करते हैं तो उस प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनते हैं । (तम्) = उस प्रभु को (गन्धर्वः) = [गां धारयति] ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाले ज्ञानी पुरुष (प्रत्यगृभ्णन्) = ग्रहण करते हैं। सूर्य दुहिता, अर्थात् वेदवाणी के द्वारा, ये गन्धर्व प्रभु का ज्ञान प्राप्त करते हैं। (तं रसम्) = उस आनन्दमय प्रभु को [रसो वैस: ] (सोमे) = सोम के सुरक्षित होने पर (आदधुः) = अपने हृदयों में स्थापित करते हैं । सो हे (इन्दो) = सोम ! तू (इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्त्रव) = शरीर में चारों ओर परिस्रुत हो । तेरे द्वारा ही ज्ञानाग्नि का वर्धन होगा। जिस ज्ञानाग्नि से हम प्रभु के दर्शन के लिये अपने हृदयों को पवित्र कर पायेंगे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये वेदवाणी, इसके धारण के द्वारा ज्ञानधारण, तथा सोमरक्षण साधन बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पर्जन्यवृद्धं)  यो  गम्भीरघटेव  वृद्धिं  प्राप्तः  (सूर्य्यस्य, दुहिता) द्युलोकपुत्री  श्रद्धा  (तं)  उक्तगुणसम्पन्नं  (महिषं)  पूजार्हं  राजानं (आभरत्) ऐश्वर्यगुणैः पूरयति (तं) तं राजानं  (गन्धर्वाः) गानवेत्तारः ये च (प्रति, अगृभ्णन्) प्रत्येकभावग्राहकाः (तं)  तमीश्वरभावात्मकं रसं (सोमे) जगदुत्पादके परमात्मनि  (रसं)  यो  रसस्तं (आदधुः) धारयन्तः (इन्द्राय) पूर्वोक्तराजाय गायन्तु  (इन्दो)  हे परमात्मन् ! (परि, स्रव) राजाभिषेकहेतुर्भवतु भवान् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Soma, glory of life, growing great as the cloud by the cloud, daughter of the sun, the dawn and divine faith, brings to the earth. The forces that sustain the earth take and fill that glory of soma with beauty and joy of life. O Indu, spirit of power and grace of glory, flow for the power and majesty of Indra in the service of divinity.