ऋतवाकेन श्रद्धया सत्येन तपसा
पदार्थान्वयभाषाः - हे (दिशांपते) = शास्त्र निर्देशों का रक्षण करनेवाले, अर्थात् शास्त्र निर्दिष्ट मार्ग से जीवन को प्रणीत करनेवाले, और इस प्रकार (मीढ्वः) = शक्ति का सेचन करनेवाले (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (आर्जीकात्) = [ऋजीकस्य अयम्, ऋजीक - इन्द्र] इन्द्रलोक की प्राप्ति के हेतु से (आपवस्व) = हमें प्राप्त हो। तेरे द्वारा ही इन्द्रलोक की प्राप्ति का सम्भव हैं। (ऋतवाकेन) = सत्य वेदज्ञान के उच्चारण से, (सत्येन) = सत्य से, (श्रद्धया) = श्रद्धा से तथा (तपसा) = तप से (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ तू हे (इन्दो) = सोम ! (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्स्रव) = शरीर के अंग-प्रत्यंग में परिस्रुत हो । सोमरक्षण के लिये 'ज्ञान की वाणियों का उच्चारण, अर्थात् स्वाध्याय, सत्य व्यवहार, श्रद्धा, व तप' साधन बनते हैं। सुरक्षित सोम हमारे जीवनों को शास्त्र निर्देश के अनुसार बनाता है, यह हमें शक्ति सम्पन्न बनाता हुआ प्रभु को प्राप्त कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये 'स्वाध्याय, सत्य, श्रद्धा व तप' साधन हैं। सुरक्षित सोम इहलोक के जीवन को शास्त्र मर्यादा से बद्ध बनाता है और प्रभु की प्राप्ति का साधन होता है।