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आ प॑वस्व दिशां पत आर्जी॒कात्सो॑म मीढ्वः । ऋ॒त॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॒ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā pavasva diśām pata ārjīkāt soma mīḍhvaḥ | ṛtavākena satyena śraddhayā tapasā suta indrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । प॒व॒स्व॒ । दि॒शा॒म् । प॒ते॒ । आ॒र्जी॒कात् । सोम॑ । मीढ्वः॑ । ऋ॒त॒ऽवा॒केन॑ । स॒त्येन॑ । श्र॒द्धया॑ । तप॑सा । सु॒तः । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:113» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक (मीढ्वः) कामप्रद (दिशां, पते) सर्वव्यापक परमात्मन् ! आप (आर्जीकात्) सरलभाव से प्रजा में (आ, पवस्व) पवित्रता उत्पन्न करते हुए (ऋतवाकेन, सत्येन) वाणी के सत्य से (श्रद्धया, तपसा) श्रद्धा तथा तप से (सुतः) जो राज्याभिषेक के योग्य है, ऐसे (इन्द्राय) राजा के लिये (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (परि, स्रव) राज्याभिषेक का निमित्त बनें ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र का आशय यह है कि जो राजा सरल भाव से प्रजा पर शासन करता हुआ श्रद्धा, तप तथा सत्यादि गुणों को धारण करता है, ऐसे कर्मशील राजा के राज्य को परमात्मा अटल बनाता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋतवाकेन श्रद्धया सत्येन तपसा

पदार्थान्वयभाषाः - हे (दिशांपते) = शास्त्र निर्देशों का रक्षण करनेवाले, अर्थात् शास्त्र निर्दिष्ट मार्ग से जीवन को प्रणीत करनेवाले, और इस प्रकार (मीढ्वः) = शक्ति का सेचन करनेवाले (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (आर्जीकात्) = [ऋजीकस्य अयम्, ऋजीक - इन्द्र] इन्द्रलोक की प्राप्ति के हेतु से (आपवस्व) = हमें प्राप्त हो। तेरे द्वारा ही इन्द्रलोक की प्राप्ति का सम्भव हैं। (ऋतवाकेन) = सत्य वेदज्ञान के उच्चारण से, (सत्येन) = सत्य से, (श्रद्धया) = श्रद्धा से तथा (तपसा) = तप से (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ तू हे (इन्दो) = सोम ! (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्स्रव) = शरीर के अंग-प्रत्यंग में परिस्रुत हो । सोमरक्षण के लिये 'ज्ञान की वाणियों का उच्चारण, अर्थात् स्वाध्याय, सत्य व्यवहार, श्रद्धा, व तप' साधन बनते हैं। सुरक्षित सोम हमारे जीवनों को शास्त्र निर्देश के अनुसार बनाता है, यह हमें शक्ति सम्पन्न बनाता हुआ प्रभु को प्राप्त कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये 'स्वाध्याय, सत्य, श्रद्धा व तप' साधन हैं। सुरक्षित सोम इहलोक के जीवन को शास्त्र मर्यादा से बद्ध बनाता है और प्रभु की प्राप्ति का साधन होता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सोमस्वभाव  (मीढ्वः) कामप्रद (दिशाम्, पते) सर्वव्यापक परमात्मन् ! भवान्  (आर्जीकात्)  सरलताभावेन प्रजासु  ( आ, पवस्व)  पवित्रतामुत्पादय  (ऋतवाकेन,  सत्येन)  वाक्सत्यतया (श्रद्धया) श्रद्धया च (तपसा) तपसा च (सुतः) यो  राज्यार्हः तस्मै (इन्द्राय) राज्ञे (परि, स्रव) अभिषेकहेतुर्भवतु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Indu, Soma, spirit of power and glory, master ruler and protector of the quarters of space, virile and generous, realised with faith and relentless austere discipline in pursuance of the Vedic voice, come from the depths of nature and simplicity of eternal law, and flow, pure and purifying, for Indra, the ruling soul, in the service of divinity.