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यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म् । स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yatra kāmā nikāmāś ca yatra bradhnasya viṣṭapam | svadhā ca yatra tṛptiś ca tatra mām amṛtaṁ kṛdhīndrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्र॑ । कामाः॑ । नि॒ऽका॒माः । च॒ । यत्र॑ । ब्र॒ध्नस्य॑ । वि॒ष्टप॑म् । स्व॒धा । च॒ । यत्र॑ । तृप्तिः॑ । च॒ । तत्र॑ । माम् । अ॒मृत॑म् । कृ॒धि॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:113» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र, कामाः) यहाँ सब काम (निकामाः) निष्काम किये जाते हैं (च) और (यत्र) यहाँ (ब्रध्नस्य) ब्रह्मज्ञान का (विष्टपं) सर्वोच्च पद है, (यत्र) यहाँ (स्वधा) अमृत (च) और उससे (तृप्तिश्च) तृप्ति है, (तत्र) वहाँ (मां) मुझको (अमृतं, कृधि) मोक्षपद प्राप्त करायें। (इन्दो) हे परमात्मन् ! आप (इन्द्राय) ज्ञानयोगी के (परि, स्रव) पूर्णाभिषेक का निमित्त बनें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - हे परमात्मन् ! जो ब्रह्मज्ञान का उच्चपद है और जहाँ स्वधा से तृप्ति होती है, वह मोक्षरूप सुख मुझे प्रदान कीजिये, या यों कहो कि वह मुक्तिसुख जिससे एकमात्र ब्रह्मानन्द का ही अनुभव होता है, अन्य विषय सुख आदि जिस अवस्था में सब तुच्छ हो जाते हैं, वह मुक्ति अवस्था मुझे प्राप्त करायें ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वधा च यत्र तृप्तिश्च

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्दो) = सोम ! (माम्) = मुझे तत्र वहाँ (अमृतं कृधि) = पूर्ण नीरोग स्थिति प्राप्त करा, (यत्र) = जहाँ कि (कामाः) = ये सारे सांसारिक काम्य विषय (निकामाः) = निकाम हो जाते हैं, नीचे दब जाते हैं । इनसे ऊपर उठकर के जब हम कामकामी न रहकर वास्तविक शान्ति को प्राप्त करते हैं। (च) = और (यत्र) = जहाँ (ब्रध्नस्य) = उस महान् आदित्यवर्ण प्रभु का (विष्टपम्) = देदीप्यमान लोक है। इन कामनाओं से ऊपर उठकर जहाँ हम प्रभु में ही विचरण करते हैं । (च) = और हे सोम ! तू मुझे वहाँ अमृत कर यत्र=जहाँ कि स्वधा = आत्मतत्त्व का धारण होता है (च) = और (तृप्तिः) = वास्तविक तृप्ति का अनुभव होता है, जहाँ हम 'आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्मतृप्त' बनते हैं [यत्र चात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ]। हे सोम ! इस स्थिति में प्राप्त कराने के लिये तू (इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्रव) = शरीर में चारों ओर परिस्रुत हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण हमें सांसारिक काम्य पादर्थों की कामना से ऊपर उठाता है, ब्रह्मलोक में पहुँचाता है, आत्मरति, आत्मतृप्त बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र) यस्मिन् (कामाः) सर्वकामाः (नि, कामाः) निष्कामाः क्रियन्ते(च) तथा च (यत्र, ब्रध्नस्य)  यत्र ब्रह्मज्ञानस्य (विष्टपे)  सर्वोपर्युच्च- पदमस्ति (स्वधा) अमृतं चास्ति (तृप्तिः, च) तया तृप्तिश्च (तत्र) तत्रस्थाने (मां) मां (अमृतं, कृधि)  मोक्षपदभागिनं करोतु (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! भवान् (इन्द्राय) ज्ञानयोगिने (परि, स्रव)पूर्णाभिषेकहेतुर्भवतु ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Where all desire is beyond desire, where knowledge is climactic supreme, where faith, self- sacrifice, surrender and the self itself is fulfilment, there in that heaven of peace, place me immortal. O Indu, spirit of universal eternal peace, flow for Indra, the soul of existence.