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जर॑तीभि॒रोष॑धीभिः प॒र्णेभि॑: शकु॒नाना॑म् । का॒र्मा॒रो अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर॑ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

jaratībhir oṣadhībhiḥ parṇebhiḥ śakunānām | kārmāro aśmabhir dyubhir hiraṇyavantam icchatīndrāyendo pari srava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जर॑तीभिः । ओष॑धीभिः । प॒र्णेभिः॑ । श॒कु॒नाना॑म् । का॒र्मा॒रः । अश्म॑ऽभिः । द्युऽभिः॑ । हिर॑ण्यऽवन्तम् । इ॒च्छ॒ति॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११२.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:112» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जरतीभिः) प्राचीन (ओषधीभिः) ओषधियों से निर्मित (शकुनानां, पर्णेभिः) उन्नतिशील पुरुषों के नभोयानादि विमानों द्वारा (कार्मारः) शिल्पी लोग (अश्मभिः, द्युभिः) दीप्तिवाले वज्रादि शस्त्रों से (हिरण्यवन्तं) ऐश्वर्य्यवाले राजा की (इच्छन्ति) इच्छा करते हैं, (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्राय) उक्त ऐश्वर्य्यसम्पन्न राजा के लिये (परि, स्रव) अभिषेक का कारण बनें ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो राजा दीप्तिवाले अस्त्र-शस्त्र तथा विमानादि द्वारा सर्वत्र गतिशील होता है, वह परमात्मा की कृपा से ही उत्पन्न होता है, या यों कहो कि पूर्वकृत प्रारब्ध कर्मों के अनुसार परमात्मा ही ऐसे राजा को अभिषिक्त करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ओषधियाँ, पर्णभस्म व युक्ताभस्म

पदार्थान्वयभाषाः - के (जरतीभिः ओषधीभिः) = परिपक्व व रोगों को जीर्ण करनेवाली ओषधियों से, (शकुनानां पर्णेभिः) = पक्षियों के पंखों से तथा (द्युभिः अश्मभिः) = ज्योतिर्मय पाषाणों से [हीरों] (कार्मार:) = क्रियाकुशल व्यक्ति (हिरण्यवन्तम्) = धनवाले पुरुष को (इच्छति) = चाहता है, इनके विक्रय के द्वारा वह अपने को धनी बनाना चाहता है । हे (इन्दो) = शक्तिशाली सोम ! तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष लिये (परिस्त्रव) = प्राप्त हो। जैसे वे हिरण्यवान् पुरुष को चाहते हैं, तू इस जितेन्द्रिय की कामना कर । शरीर में कभी रोग आदि आ जाते हैं और समान्यतः मनुष्य ओषधियों के प्रयोग से, पक्षियों के पंखों की भस्म बनाकर व मुक्ताभस्म आदि के द्वारा अपने को नीरोग बनाने की कामना करता है, इन से ही वह अपने को शक्तिशाली बनाना चाहता है । परन्तु सर्वोत्तम उपाय इस सोम का रक्षण ही है। इसके लिये हम जितेन्द्रिय बनें। यह जितेन्द्रियता सोमरक्षण द्वारा हमारे सब रोगों को विशेषरूप से कम्पित करके दूर करनेवाली होगी, यह तो है ही 'वीर्य' [वि + ईर] विशेष रूप से रोगरूप शत्रुओं को कम्पित करनेवाला ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ–हम ओषधियों, पर्णभस्म व मुक्ताभस्मों के प्रयोग से रोगों को दूर करने की अपेक्षा शरीर में सोम [वीर्य] का धारण करें। इसे ही सर्वोत्तम औषध जानें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जरतीभिः) प्राचीनाभिः  (ओषधीभिः)  लताभिर्निर्मितैः  (शकुनानाम्, पर्णेभिः) उन्नतिशीलजनानां नभोयानादिविमानैः  (कार्मारः)  शिल्पिनः (अश्मभिः, द्युभिः) वज्रादिशस्त्रैः  (हिरण्यवन्तं) ऐश्वर्य्यवन्तं  राजानं (इच्छति) वाञ्च्छति  (इन्द्राय)  उक्तैश्वर्य्यवते राज्ञे  (इन्दो)  हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् !  भवान् (परि, स्रव)  अभिषेकहेतुर्भवतु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With ripe herbs, bird’s feathers and with stones and flames, the smith makes the arrows and seeks the man of gold who can buy. O bright and sparkling Soma, you go forward with Indra, ruler of the social order.