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अ॒या रु॒चा हरि॑ण्या पुना॒नो विश्वा॒ द्वेषां॑सि तरति स्व॒युग्व॑भि॒: सूरो॒ न स्व॒युग्व॑भिः । धारा॑ सु॒तस्य॑ रोचते पुना॒नो अ॑रु॒षो हरि॑: । विश्वा॒ यद्रू॒पा प॑रि॒यात्यृक्व॑भिः स॒प्तास्ये॑भि॒ॠक्व॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayā rucā hariṇyā punāno viśvā dveṣāṁsi tarati svayugvabhiḥ sūro na svayugvabhiḥ | dhārā sutasya rocate punāno aruṣo hariḥ | viśvā yad rūpā pariyāty ṛkvabhiḥ saptāsyebhir ṛkvabhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒या । रु॒चा । हरि॑ण्या । पु॒ना॒नः । विश्वा॑ । द्वेषां॑सि । त॒र॒ति॒ । स्व॒युग्व॑ऽभिः । सूरः॑ । न । स्व॒युग्व॑ऽभिः । धारा॑ । सु॒तस्य॑ । रो॒च॒ते॒ । पु॒ना॒नः । अ॒रु॒षः । हरिः॑ । विश्वा॑ । यत् । रू॒पा । प॒रि॒ऽयाति॑ । ऋक्व॑ऽभिः । स॒प्तआ॑स्येभिः । ऋक्व॑ऽभिः ॥ ९.१११.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:111» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब शूरवीर का कर्तव्य कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (हरिः) “हरतीति हरिः”=परपक्ष को हरण करनेवाला शूरवीर (अरुषः) उग्र तेजवाला (पुनानः) अपने वीर कर्मों से पवित्र करनेवाला (सुतस्य, धारा) संस्कार की धारा से (रोचते) दीप्तिमान् होता है, (हरिण्या) शुत्रओं को हनन करनेवाली (अया) इस (रुचा) दीप्ति से (पुनानः) पवित्र करता हुआ (स्वयुग्वभिः) अपनी स्वाभाविक शक्तियों द्वारा (विश्वा, द्वेषांसि) सब शत्रुओं को (तरति) हनन करता है, (न) जैसे (सूरः) सूर्य्य (स्वयुग्वभिः) अपनी स्वाभाविक शक्तियों से अन्धकार का नाशक होता है, (यत्) जैसे (सप्तास्येभिः) सात मुखोंवाली (ऋक्वभिः) किरणों से (विश्वा, रूपा) नानारूपों को धारण करता हुआ सूर्य्य (परियाति) प्राप्त होता है, इसी प्रकार (ऋक्वभिः) ज्ञानेन्द्रियों के सप्त छिद्रों से निकले हुए तेज द्वारा शूरवीर परपक्ष को प्राप्त होता है, इसलिये वह सूर्य्य की सप्त किरणों की तुलना करता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में रूपकालंकार से शूरवीर की सूर्य्य के साथ तुलना की गई है अर्थात् जिस प्रकार सूर्य्य अपने तेजोमय प्रभामण्डल से अन्धकार को छिन्न-भिन्न करता है, इसी प्रकार शूरवीर योधा शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके स्वयं स्थिर होता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विश्वा द्वेषांसि तरति

पदार्थान्वयभाषाः - यह सोम (अया) = [अनया] अपनी इस (हरिण्या) = अज्ञानान्धकारों का हरण करनेवाली (रुचा) = दीप्ति से (पुनानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करता हुआ (स्वयुग्वभिः) = आत्मतत्त्व के साथ मेल वाली चित्तवृत्तियों के द्वारा (विश्वा द्वेषांसि) = सब द्वेष की भावनाओं को (तरति) = तैर जाता है। (सूरः न) = सूर्य के समान यह हमारे जीवन में ज्ञान के प्रकाश को करता हुआ सोम (स्वयुग्वभिः) = आत्मा के साथ मेल वाली इन्द्रियों से द्वेष की भावनाओं से पार हो आता है। वैषयिक रुचि वाली इन्द्रियाँ ही पारस्परिक द्वेष को उपजाती हैं। (सुतस्य) = शरीर में उत्पन्न किये गये इस सोम की (धारा) = धारण शक्ति (रोचते) = हमारे जीवन में दीप्त होती है। यह (पुनानः) = पवित्र करता हुआ सोम (अरुषः) = [अ+रुष] क्रोध शून्य होता है और (हरिः) = हमारे सब कष्टों व रोगों का हरण करता है। ऐसा यह तब करता है (यत्) = जब कि (ऋक्वभिः) = [ऋच् स्तुतौ] ज्ञान की वाणियों द्वारा प्रभुस्तवन होने पर विश्वा रूपा (परियाति) = सब सौन्दर्यों को [रूप beauty ] सर्वतः प्राप्त होता है। (सप्तास्येभिः) = 'कर्णाविमौ नसिके चक्षणी मुखम्' इन सातों मुख रूप इन्द्रियों से (ऋक्वभिः)' = 'ज्ञानपूर्वक स्तुतियों के होने पर शरीर में सुरक्षित सोम सब अंगों को सशक्त बनाकर सौन्दर्य प्रदान करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- इन्द्रिय संयम के द्वारा आत्मतत्त्व के साथ मेल वाली इन्द्रियों से तथा ज्ञानपूर्वक साधन करती हुई इन्द्रियों से शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम हमें अपनी मलहारिणी कान्ति से पवित्र करता है और द्वेषों से दूर करता है ।
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आर्यमुनि

अथ शूरः किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (हरिः) परपक्षहारकः  शूरः  (अरुषः)  उग्रतेजस्वी  (पुनानः) स्ववीरकर्मणा  पावयन्  (सुतस्य, धारा)  संस्कारधारया (रोचते) शोभते (हरिण्या) शत्रुहारिण्या (अया, रुचा) अनया दीप्त्या (पुनानः)पावयन्  (स्वयुग्वभिः)  स्वस्वभावशक्तिभिः  (विश्वा, द्वेषांसि) सर्वशत्रून् (तरति) समापयति (न) यथा (सूरः) सूर्य्यः (स्वयुग्वभिः)स्वशक्तिभिरन्धकारं  नाशयति एवं हि  शूरो दुष्टान्  (सप्तास्येभिः) सप्तमुखैः (ऋक्वभिः)  किरणैः (विश्वा, रूपा)  नानारूपं  दधत् यथा सूर्यः  (परियाति)  प्राप्नोति,  एवं  हि  (ऋक्वभिः)  ज्ञानेन्द्रियाणां सप्तछिद्रनिःसृततेजोभिः (यत्)  यतः शूरः परपक्षं प्राप्नोति, अत एव सप्तकिरणवता सूर्येणोपमीयते ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma spirit of the fighting force of divinity, protecting and purifying by its own victorious lustre of innate powers, overcomes all forces of jealousy and enmity as the sun dispels all darkness with its own rays of light. The stream of its radiance, realised and purifying, shines beautiful and blissful. The lustrous saviour spirit which pervades all existent forms of the world, goes forward pure and purifying with seven notes of its exalting voice and seven rays of light and seven pranic energies expressive of its mighty force.