पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) = यह (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ [पूयमानः] (इन्दुः) = सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (पवते) = प्राप्त होता है। यह (मधुमान्) = प्रशस्त माधुर्य वाला है, जीवन के सब व्यवहारों में माधुर्य का सञ्चार करता है । और (ऋतावा) = ऋतवाला होता है, हमारे जीवन से अनृत को दूर करता है । (स्वादुः) = यह हमारे लिये जीवन को सरस बनाता है और (ऊर्मिः) = हमारे लिये 'प्रकाश' बनता है । यह सुरक्षित सोम ही हृदय को पवित्र करके अन्तःस्थित प्रभु के प्रकाश को प्राप्त कराता है । बुद्धि को तीव्र करके भी यह ज्ञान के प्रकाश का साधन बनता है । (वाजसनिः) = यह शक्ति को देता है । (वरिवः वित्) = सब कोशों के ऐश्वर्य को प्राप्त कराता है और (वयोधाः) = उत्कृष्ट जीवन का धारण कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जितेन्द्रिय पुरुष में सुरक्षित हुआ हुआ सोम 'माधुर्य, ऋत, आनन्द, प्रकाश, शक्ति, ऐश्वर्य व दीर्घ उत्कृष्ट जीवन' को सिद्ध करता है ।