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सोम॑: पुना॒नो अ॒व्यये॒ वारे॒ शिशु॒र्न क्रीळ॒न्पव॑मानो अक्षाः । स॒हस्र॑धारः श॒तवा॑ज॒ इन्दु॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somaḥ punāno avyaye vāre śiśur na krīḻan pavamāno akṣāḥ | sahasradhāraḥ śatavāja induḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोमः॑ । पु॒ना॒नः । अ॒व्यये॑ । वारे॑ । शिशुः॑ । न । क्रीळ॑न् । पव॑मानः । अ॒क्षा॒रिति॑ । स॒हस्र॑ऽधारः । श॒तऽवा॑जः । इन्दुः॑ ॥ ९.११०.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:110» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:23» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सर्वोत्पादक (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला (अव्यये, वारे) रक्षायुक्त पदार्थों में (शिशुः, न, क्रीळन्) प्रशंसनीय वस्तुओं के समान क्रीडा करता हुआ (सहस्रधारः) अनन्त प्रकार की शक्तियों से युक्त (शतवाजः) अनन्त प्रकार के बलोंवाला (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (पुनानः) ज्ञानवृद्धि द्वारा पवित्र करता हुआ (अक्षाः) अपनी सुधावारि से सबको सिञ्चन करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के गुण तथा शक्तियें अनन्त हैं और जिनसे उसके स्वरूप का निरूपण किया जाता है, वे गुण भी उसमें अनन्त हैं, इसलिये अनन्तस्वरूप की अनन्तरूप से ही उपासना करनी चाहिये ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शतवानः इन्दुः

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) = सोम (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (अव्यये) = [अवि अय्] विषय वासनाओं में न भटकनेवाले (वारे) = द्वेष आदि का निवारण करनेवाले में (शिशुः न) = बुद्धि को तीव्र करनेवाले के समान (क्रीडन्) = क्रीडा करता हुआ, सब कार्यों को क्रीडक की मनोवृत्ति से कराता हुआ (अक्षाः) = व्याप्त होता है । सोमरक्षण के लिये हमें 'अव्यय व वार' बनना है। सुरक्षित हुआ हुआ यह हमें तीव्र बुद्धि व क्रीडक की मनोवृत्ति वाला बनाएगा। हम संसार की द्वन्द्वात्मक घटानाओं में अव्याकुल होकर चल सकेंगे। (पवमानः) = यह पवित्र करता हुआ सोम (सहस्त्राधारः) = हमें हजारों प्रकार से धारण करता है । (शतवाज:) = सौ वर्ष के पूर्ण आयुष्यपर्यन्त शक्तिशाली बनायें रखता है और (इन्दुः) = शक्तिशाली होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम बुद्धि को तीव्र करता है, हमें क्रीडक की मनोवृत्ति वाला बनाता है, पूर्ण आयुष्यपर्यन्त शक्तिशाली बनाये रखता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सर्वोत्पादकः  परमात्मा  (अव्यये, वारे)  रक्षायुक्ते पदार्थे (शिशुः, न)  प्रशंसनीयवस्तु  इव  (क्रीळन्)  क्रीडन्  (पवमानः) सर्वपावकः (सहस्रधारः) अनन्तशक्तियुक्तः (शतवाजः) विविधबलयुक्तः (इन्दुः)  प्रकाशस्वरूपः  सः  (पुनानः)  पवित्रीकुर्वन्  (अक्षाः) स्वसुधावारिणा सिञ्चति ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And that long may Soma bless us, pure and purifying, vibrant as wind and joyously manifesting playfully as a darling spirit in the protective world of choice beauty, flowing with a thousand streams and commanding a hundred forces of existence, blissful, brilliant and gracious as it is.