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हस्त॑च्युतेभि॒रद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ पुनीतन । मधा॒वा धा॑वता॒ मधु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hastacyutebhir adribhiḥ sutaṁ somam punītana | madhāv ā dhāvatā madhu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हस्त॑ऽच्युतेभिः । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । सोम॑म् । पु॒नी॒त॒न॒ । मधौ॑ । आ । धा॒व॒त॒ । मधु॑ ॥ ९.११.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:11» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:36» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! आप (हस्तच्युतेभिः अद्रिभिः) वाणीरूप वज्र से (सुतम्) कूट २ कर (सोमम्) मेरे स्वभाव को (पुनीतन) पवित्र करें ताकि (मधौ) आप के मधुर स्वरूप में (मधु) मीठा बन कर (आधावत) लगे ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का वाग्रूपी वज्र जिस पुरुष की अविद्या की लता को काटता है, वह पुरुष सरलप्रकृति बन कर परमात्मा के आनन्दमय स्वरूप में निमग्न होता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मधु' में मधु का शोधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोमम्) = शरीरस्थ इस सोम [वीर्य] धातु को (पुनीतन) = पवित्र करो। जो सोम धातु (हस्तच्युतेभिः) = दान देने में खुले हाथवालों से [not close-fisted] जिनकी मुट्ठी सदा खुली है, जिनके हाथ से दान के रूप में धन क्षरित होता रहता है, ऐसे (अद्रिभिः) = [to adore] प्रभु का पूजन करनेवालों से सुतम् = उत्पन्न किया जाता है। दान की वृत्ति भोगवृत्ति को समाप्त करती है और इस प्रकार सोमरक्षण का साधन बन जाती है। प्रभु की उपासना भी हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाये रखती है। इस प्रकार यह भी सोम की रक्षिका बनती है। [२] (मधौ) = सारे ब्रह्माण्ड के सारभूत उस परब्रह्म में (मधु) = ओषधियों के सारभूत इस सोम का (आधावता) = धावन [शोधन] करो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- परब्रह्म में सोम का शोधन यही है कि परब्रह्म के उपासन से वासनाओं से बचे रहना । ये वासनायें ही तो सोम का विनाश करती हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! भवान् (हस्तच्युतेभिः अद्रिभिः) वाग्वज्रैः (सुतम्) क्षुण्णम् (सोमम्) मम स्वभावं (पुनीतन) पावयतु येन (मधौ) भवदीयमधुरस्वरूपे (मधु) मधुरो भूत्वा (आधावत) प्रवर्तताम् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As soma juice is extracted with stones worked by hands, refined and seasoned with honey and milk, so O lord, let my mind be refined and purified with repeated chants of the sacred voice, and let it be sanctified with the honey of devotion and let it be absorbed in the honey sweet of divinity.