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ए॒वामृता॑य म॒हे क्षया॑य॒ स शु॒क्रो अ॑र्ष दि॒व्यः पी॒यूष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evāmṛtāya mahe kṣayāya sa śukro arṣa divyaḥ pīyūṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । अ॒मृता॑य । म॒हे । क्षया॑य । सः । शु॒क्रः । अ॒र्ष॒ । दि॒व्यः । पी॒यूषः॑ ॥ ९.१०९.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:109» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (शुक्रः) आप बलस्वरूप (दिव्यः) दिव्यस्वरूप (पीयूषः) विद्वानों के लिये अमृत हैं, (सः) उक्तगुणसम्पन्न आप (महे) सदा के निवासार्थ (अमृताय) मुक्तिसुख तथा (क्षयाय) दोषनिवृत्ति के लिये (एव) इस प्रकार (अर्ष) प्राप्त हों, जिससे हम सदैव आपके आनन्द को भोग सकें ॥३॥
भावार्थभाषाः - यहाँ मुक्तिरूप सुख का “पीयूष” शब्द से वर्णन किया है। ब्रह्मानन्द का नाम ही पीयूष है और उसी को अमृत, पीयूष, मुक्ति इत्यादि नाना प्रकार के शब्दों से कथन किया गया है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुक्र - दिव्य - पीयूष

पदार्थान्वयभाषाः - (एवा) = इस प्रकार हे सोम ! (सः) = वह तू (अमृताय) = नीरोगता के लिये हो । (महेक्षयाय) = जीवन में महत्त्वपूर्ण निवास व गति के लिये हो । तेरे रक्षण से रोगरूप मृत्युएँ हमारे से दूर रहें और हम जीवन में महत्त्वपूर्ण कार्यों को कर सकें। हे सोम ! (शुक्रः) = अत्यन्त दीप्त ज्ञान रूप दीप्ति को प्राप्त करानेवाला (दिव्यः) = दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाला (पीयूष:) = अमृतत्व के गुण से युक्त तू (अर्ष) = हमें प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम नीरोग व महत्त्वपूर्ण जीवन को प्राप्त कराता है। यह दीप्त, दिव्य व अमृत है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! भवान् (शुक्रः) बलस्वरूपः (दिव्यः) दिव्यस्वरूपश्च (पीयूषः) विद्वद्भ्यः अमृतं (सः) स भवान् (महे) शश्वन्निवासाय (अमृताय) मुक्तिसुखाय च (क्षयाय) दोशनाशाय च (एव, अर्ष) एवं मां प्राप्नोतु येन सदैवाहमानन्दं भोक्तुं शक्नुयाम् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus for immortality, for great dominion and for highest ascension, may that pure, potent and celestial Soma presence flow and radiate as the sweetest taste of life.